SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1120

1871 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
हि꣣न्वाना꣢सो꣣ र꣡था꣢ इव दधन्वि꣣रे꣡ गभ꣢꣯स्त्योः । भ꣡रा꣢सः का꣣रि꣡णा꣢मिव ॥११२०॥

हिन्वाना꣡सः꣢ । र꣡थाः꣢꣯ । इ꣣व । दधन्विरे꣢ । ग꣡भ꣢꣯स्त्योः । भ꣡रा꣢꣯सः । का꣣रि꣡णा꣢म् । इ꣣व ॥११२०॥

Mantra without Swara
हिन्वानासो रथा इव दधन्विरे गभस्त्योः । भरासः कारिणामिव ॥

हिन्वानासः । रथाः । इव । दधन्विरे । गभस्त्योः । भरासः । कारिणाम् । इव ॥११२०॥

Samveda - Mantra Number : 1120
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 8; Khand » 1;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(इव) जैसे (रथाः) रथ, रथ-स्वामियों को प्रगति देते हैं, वैसे अपने उपदेशों द्वारा प्रजाजनों को (हिन्वानासः) प्रगति देते हुए उपासक, (गभस्त्योः) अपने पालनपोषण के लिये प्रजाजनों के हाथों में (दधन्विरे) आश्रय पाते हैं, (इव) जैसे कि (भरासः) भरण-पोषण योग्य कैदी, (कारिणाम्) कारागार के अध्यक्षों के हाथों में, आश्रय पाते हैं ।
Footnote
[ गभस्ती = बाहू (निघं० २। ४) । कैदी सर्वथा अपने अध्यक्षों के हाथों निश्चित भरण-पोषण वाले हैं, इसलिये भरण-पोषण में ऐसी उपमा दी गई है ]