SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1105

1871 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
उ꣣त꣡ न꣢ ए꣣ना꣡ प꣢व꣣या꣡ प꣢व꣣स्वा꣡धि꣢ श्रु꣣ते꣢ श्र꣣वा꣡य्य꣢स्य ती꣣र्थे꣢ । ष꣣ष्टि꣢ꣳ स꣣ह꣡स्रा꣢ नैगु꣣तो꣡ वसू꣢꣯नि वृ꣣क्षं꣢꣫ न प꣣क्वं꣡ धू꣢नव꣣द्र꣡णा꣢य ॥११०५॥

उ꣣त꣢ । नः꣣ । एना꣢ । प꣣वया꣢ । प꣢वस्व । अ꣡धि꣢꣯ । श्रु꣣ते꣢ । श्र꣣वा꣡य्य꣢स्य । ती꣣र्थे꣢ । ष꣣ष्टि꣢म् । स꣣ह꣡स्रा꣢ । नै꣣गुतः꣢ । नै꣣ । गुतः꣢ । व꣡सू꣢꣯नि । वृ꣣क्ष꣢म् । न । प꣣क्व꣡म् । धू꣣नवत् । र꣡णा꣢꣯य ॥११०५॥

Mantra without Swara
उत न एना पवया पवस्वाधि श्रुते श्रवाय्यस्य तीर्थे । षष्टिꣳ सहस्रा नैगुतो वसूनि वृक्षं न पक्वं धूनवद्रणाय ॥

उत । नः । एना । पवया । पवस्व । अधि । श्रुते । श्रवाय्यस्य । तीर्थे । षष्टिम् । सहस्रा । नैगुतः । नै । गुतः । वसूनि । वृक्षम् । न । पक्वम् । धूनवत् । रणाय ॥११०५॥

Samveda - Mantra Number : 1105
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 6;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
हे परमेश्वर ! आप (पवया) अपनी आनन्दरसमयी धारा द्वारा (पवस्व) हम में प्रवाहित हुजिये और हमें पवित्र कीजिये । (उत) तथा (श्रवाय्यस्य) श्रवण मनन योग्य आपके, —(तीर्थे) भवसागर से तैराने वाले, — (श्रुते अधि) वेद में प्रतिपादित जो (षष्टिं सहस्रा) ६० हजार (नैगुतः) नैगम रत्न हैं, (एना वसूनि) इन उपदेश रत्नों को, आप (नः रणाय) हमारी रमणीयता के लिये प्रदान कीजिये, (न) जैसे कि कोई (पक्वं वृक्षम्) पके फलों वाले वृक्ष को (धूनवत्) कम्पा कर, (रणाय) वृक्ष के नीचे खड़े व्यक्ति की प्रसन्नता के लिये, उसे पके फल देता है ।
Footnote
[ १९५६ में श्रीमती सार्वदेशिक सभा की ओर से दयानन्द वाटिका, दिल्ली में अनुसन्धान विभाग में मैं जब सामवेद पर लिख रहा था, तब मुझे “षष्टिं सहस्रा” का अर्थ यह प्रतीत हुआ था कि चारों वेदों के लगभग २० हजार मन्त्र हैं, प्रत्येक मन्त्र के आध्यात्मिक, आधि दैविक और आधिभौतिक अर्थ स्वीकार करने पर नैगम रत्न ६० हजार हो जाते हैं। ऐसा ही सुझाव श्री पं० धर्मदेवजी विद्यामार्तण्ड, आनन्द कुटीर, ज्वालापुर ने भी दिया है। जब तक और कोई उचित समाधान “षष्टिं सहस्रा” का नहीं मिलता तब तक इसी समाधान को उत्तम समझना चाहिये । परन्तु इस समाधान में दो आपत्तियां प्रतीत होती हैं । एक यह कि चारों वेदों के मन्त्र २० हजार से अधिक हैं, दूसरी यह कि प्रत्येक मन्त्र के तीन-तीन अर्थ अवश्य हैं, यह कथन सम्भवतः साध्यकोटि में प्रविष्ट है। किसी भी प्राचीन आचार्य ने अभी तक यह धारणा नहीं दर्शाई कि वेदों के प्रत्येक मन्त्र के तीन-तीन अर्थ होते हैं । वेद की उक्ति यथार्थ होनी चाहिये, काल्पनिक नहीं ।
मेरी दृष्टि में “षष्टिं सहस्रा” पद “असंख्येय” की भावना को प्रकट करते हैं । और इस “असंख्येय” अर्थ के ग्रहण में एक “सृष्टिगत घटना” भी प्रतीत होती है । दिन-रात, सप्ताह, मास के परिवर्तनों की अपेक्षया “ऋतु परिवर्तन” का प्रभाव जड़-चेतन पर अधिक अनुभूतिगम्य होता है । प्रत्येक ऋतु यतः दो मासों की होती है, इसलिए वेदों में एक वर्ष में ६ ऋतुएं मानी हैं । वैदिक वर्ष ३६० दिनों का माना गया है । इसलिये प्रत्येक ऋतु ६० दिनों की होती है । सूर्य को सहस्रांशु, तथा सहस्ररश्मि, और सहस्रशृङ्ग भी कहा है । इस में सहस्र शब्द “नियत—सहस्रसंख्या” का वाचक नहीं अपितु अनियत “अधिक संख्या” का वाचक है । ६० दिनों में पृथिवी पर सहस्रांशु की कितनी किरणें पड़ती होंगी, यह कहना असम्भव है । इन किरणों को असंख्येय ही कहा जा सकता है । वेदों के भी नैगम-रत्न असंख्येय हैं,यह भावना “षष्टिं सहस्रा” पदों द्वारा प्रतीत होती है। देखा जाय तो प्रत्येक मन्त्र में कई-कई उपदेश-रत्न हमें मिलते हैं । इस दृष्टि से “नैगम-रत्न” असंख्येय हैं, यह समाधान मुझे अधिक सन्तोष-जनक प्रतीत होता है । “नैगुतो वसूनि” = नैगुता उ वसूनि = नैगुतानि उ वसूनि । निगुत् = नि + गु (शब्दे) + क्विप् + तुक् । निगुतः सम्बन्धीनि नैगतानि । अर्थात् निगम सम्बद्धानि वसूनि । “धूनवत्” शब्द का प्रयोग यह दर्शाने के लिये किया गया है कि ऋषियों के हृदयों में, परमेश्वर ने एक प्रकार के विशेष कम्पनों के रूप में, वैदिक मन्त्रों का प्रकटन किया था । (धूञ् कम्पने) ] देखो मन्त्र संख्या ३२३; “दशभिः सहस्रैः” ]