SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1086

1871 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
आ꣡ यद्दुवः꣢꣯ शतक्रत꣣वा꣡ कामं꣢꣯ जरितॄ꣣णा꣢म् । ऋ꣣णो꣢꣫रक्षं꣣ न꣡ शची꣢꣯भिः ॥१०८६॥

आ । यत् । दु꣡वः꣢꣯ । श꣣तक्रतो । शत । क्रतो । आ꣢ । का꣡म꣢꣯म् । ज꣣रितॄणा꣢म् । ऋ꣣णोः꣢ । अ꣡क्ष꣢꣯म् । न । श꣡ची꣢꣯भिः ॥१०८६॥

Mantra without Swara
आ यद्दुवः शतक्रतवा कामं जरितॄणाम् । ऋणोरक्षं न शचीभिः ॥

आ । यत् । दुवः । शतक्रतो । शत । क्रतो । आ । कामम् । जरितॄणाम् । ऋणोः । अक्षम् । न । शचीभिः ॥१०८६॥

Samveda - Mantra Number : 1086
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 5;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(शतक्रतो) हे सैंकड़ों कर्मों वाले प्रभो ! (जरितृणाम्) स्तोताओं की (दुवः) सेवाओं या स्तुतियों और (कामम्) उनके अभीष्ट मोक्ष को (यद्) जब आप (शचीभिः) अपनी शक्तियों द्वारा (आ ऋणोः) परस्पर सम्बद्ध कर देते हैं, (न) जैसे कि (अक्षम्) धुरी, रथ के चक्रों को, परस्पर सम्बद्ध कर देती है, —तब आप (त्मना) अपने स्वरूप के साथ स्तोताओं की आत्माओं को (युक्तः) सम्बद्ध करते हैं (मन्त्र संख्या १०८५)
Footnote
[ मन्त्र में जनसेवा और मोक्ष में कार्यकारण भाव सूचित किया है । जनता जनार्दन की निष्काम सेवा “कारण” हैं, —मोक्ष का । इस सेवा का अन्तिम फल है, — परमेश्वरीय आत्मा का स्तोताओं की आत्माओं के साथ मेल । यही मोक्ष है ]