SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1073

1871 Mantra
Devata- इन्द्राग्नी Rishi- श्यावाश्व आत्रेयः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
य꣣ज्ञ꣢स्य꣣ हि꣢꣫ स्थ ऋ꣣त्वि꣢जा꣣ स꣢स्नी꣣ वा꣡जे꣢षु꣣ क꣡र्म꣢सु । इ꣡न्द्रा꣢ग्नी꣣ त꣡स्य꣢ बोधतम् ॥१०७३॥

य꣣ज्ञ꣡स्य꣢ । हि । स्थः । ऋ꣣त्वि꣡जा꣢ । सस्नी꣢꣯इ꣡ति꣢ । वा꣡जे꣢꣯षु । क꣡र्म꣢꣯सु । इ꣡न्द्रा꣢꣯ग्नी । इ꣡न्द्र꣢꣯ । अ꣣ग्नीइ꣡ति꣢ । त꣡स्य꣢꣯ । बो꣣धतम् ॥१०७३॥

Mantra without Swara
यज्ञस्य हि स्थ ऋत्विजा सस्नी वाजेषु कर्मसु । इन्द्राग्नी तस्य बोधतम् ॥

यज्ञस्य । हि । स्थः । ऋत्विजा । सस्नीइति । वाजेषु । कर्मसु । इन्द्राग्नी । इन्द्र । अग्नीइति । तस्य । बोधतम् ॥१०७३॥

Samveda - Mantra Number : 1073
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 3;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(इन्द्राग्नी) हे बल और ज्ञान के भण्डार परमेश्वर ! आप के ये दो रूप (हि) निश्चय से (यज्ञस्य) उपासना यज्ञ के (ऋत्विजा) दो ऋत्विक् (स्थः) हैं । आप के दो रूप (वाजेषु) योगबलों की प्राप्ति में तथा (कर्मसु) योग सम्बन्धी क्रियाओं में (सस्नी) मानो हमारा स्नान करा देते हैं । हे परमेश्वर ! आप के दो रूप (तस्य) उस उपासना-यज्ञ के स्वरूप का (बोधतम्) बोघ हमें कराएँ ।
Footnote
[ योगाभ्यास के लिये शारीरिक, मानसिक और प्रात्मिक बल की भी श्रावश्यकता है, और योगविधियों और योग-क्रियामों के ज्ञान की भी आवश्यकता है । इसलिये परमेश्वर से बल और ज्ञान की प्रार्थना की गई है ]