SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1063

1871 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- जमदग्निर्भार्गवः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उ꣣त꣢ नो꣣ गो꣡म꣢ती꣣रि꣢षो꣣ वि꣡श्वा꣢ अर्ष परि꣣ष्टु꣡भः꣢ । गृ꣣णानो꣢ ज꣣म꣡द꣢ग्निना ॥१०६३॥

उ꣣त꣢ । नः꣣ । गो꣡म꣢꣯तीः । इ꣡षः꣢꣯ । वि꣡श्वाः꣢꣯ । अ꣣र्ष । परिष्टु꣡भः꣢ । प꣣रि । स्तु꣡भः꣢꣯ । गृ꣣णानः꣢ । ज꣣म꣡द꣢ग्निना । ज꣡म꣢त् । अ꣣ग्निना ॥१०६३॥

Mantra without Swara
उत नो गोमतीरिषो विश्वा अर्ष परिष्टुभः । गृणानो जमदग्निना ॥

उत । नः । गोमतीः । इषः । विश्वाः । अर्ष । परिष्टुभः । परि । स्तुभः । गृणानः । जमदग्निना । जमत् । अग्निना ॥१०६३॥

Samveda - Mantra Number : 1063
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 2;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(उत) तथा हे परमेश्वर ! (जमदग्निना) जिस ने अपने हृदय में अग्निस्वरूप आप को प्रज्वलित कर लिया है उस उपासक द्वारा, (गृणानः) आप हमें जीवनमार्ग का उपदेश देते हुए, (नः) हमें (परिष्टुभः) अति प्रशंसनीय (गोमतीः) इन्द्रिय सम्वन्धी (विश्वाः इषः) सव प्रभीष्ट (अर्ष) प्राप्त कराइये ।
Footnote
[ गोमतीः इषः = उपासक, ध्यान में, जब बाह्य इन्द्रियों के विषयों से उपरत हो जाता है, तब ध्यानप्रकर्ष द्वारा उसे आन्तरिक इन्द्रिय-विषय प्रकट होने लगते हैं, जिनकी के अभिलाषा मन्त्र में प्रकट की गई है । इन आभ्यन्तर इन्द्रियविषयों को प्रातिभ ज्ञान कहते हैं । यथाः = “ततः प्रातिभ श्रावण वेदनादर्शास्वादवार्ता जायन्ते” (योग ३। ३६) । “ते व्युत्त्याने सिद्धयः” (योग ३। ३७) अर्थात् संयम के अभ्यास से श्रावण अर्थात् श्रवणेन्द्रिय की दिव्य और दूर के शब्द सुनने की योग्यता; वेदना अर्थात् त्वचा-इन्द्रिय की दिव्यस्पर्श जानने की योग्यता; आदर्श अर्थात् नेत्रेन्द्रिय की दिव्यरूप देखने की योग्यता; आस्वाद अर्थात् रसनेन्द्रिय की दिव्यरस चखने की योग्यता; वार्ता अर्थात् घ्राणेन्द्रिय की दिव्यगन्ध सूंघने की योग्यता प्रकट हो जाती है । इन योग्यताओं से जो ज्ञान होते हैं उन्हें प्रातिभज्ञान कहते हैं । प्रातिभ का अभिप्राय है “मन में अतीन्द्रिय, छिपी हुई, और दूरस्थ, प्रतीत और भविष्य वस्तुओं को जानने की योग्यता” । ये प्रातिभज्ञान, व्युत्थितवृत्तिकचित्तों वाले योगियों के लिये, सिद्धिरूप हैं ]