SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1043

1871 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
गि꣡र꣢स्त इन्द꣣ ओ꣡ज꣢सा मर्मृ꣣ज्य꣡न्ते꣢ अप꣣स्यु꣡वः꣢ । या꣢भि꣣र्म꣡दा꣢य꣣ शु꣡म्भ꣢से ॥१०४३॥

गि꣡रः꣢꣯ । ते꣣ । इन्दो । ओ꣡ज꣢꣯सा । म꣣र्मृज्य꣡न्ते꣢ । अ꣣पस्यु꣡वः꣢ । या꣡भिः꣢꣯ । म꣡दा꣢꣯य । शु꣡म्भ꣢꣯से ॥१०४३॥

Mantra without Swara
गिरस्त इन्द ओजसा मर्मृज्यन्ते अपस्युवः । याभिर्मदाय शुम्भसे ॥

गिरः । ते । इन्दो । ओजसा । मर्मृज्यन्ते । अपस्युवः । याभिः । मदाय । शुम्भसे ॥१०४३॥

Samveda - Mantra Number : 1043
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 1;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(इन्दो) चन्द्रसम आह्लाददायक हे परमेश्वर ! (ते आपके (ओजसा) प्रताप से (गिरः) हमारी वाणियां (मर्मृज्यन्ते) पूर्णतया विशुद्ध हो जाती हैं, अर्थात् प्रिय सत्यभाषिणी हो जाती हैं तब ये (अपस्युवः) आप की स्तुति-प्रार्थना करना चाहती हैं । (मदाय) हर्ष और आनन्द की प्राप्ति के लिए, उपासक की (याभिः) जिन प्रिय सत्यमयी वाणियों द्वारा आप (शुम्भसे) शोभा को प्राप्त करते हैं, अर्थात् जिन द्वारा आपकी शोभा के गान गाए जाते है ।
Footnote
N/A