SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 103

1871 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- विश्वमना वैयश्वः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
ई꣡डि꣢ष्वा꣣ हि꣡ प्र꣢ती꣣व्याँ꣢३ य꣡ज꣢स्व जा꣣त꣡वे꣢दसम् । च꣣रिष्णु꣡धू꣢म꣣म꣡गृ꣢भीतशोचिषम् ॥१०३॥

ई꣡डि꣢꣯ष्व । हि । प्र꣣तीव्य꣢꣯म् । प्र꣣ति । व्य꣢꣯म् । य꣡ज꣢꣯स्व । जा꣣तवे꣡द꣢सम् । जा꣣त꣢ । वे꣣दसम् । चरिष्णु꣡धू꣢मम् । च꣣रिष्णु꣢ । धू꣣मम् । अ꣡गृ꣢꣯भीतशोचिषम् । अ꣡गृ꣢꣯भीत । शो꣣चिषम् ॥१०३॥

Mantra without Swara
ईडिष्वा हि प्रतीव्याँ३ यजस्व जातवेदसम् । चरिष्णुधूममगृभीतशोचिषम् ॥

ईडिष्व । हि । प्रतीव्यम् । प्रति । व्यम् । यजस्व । जातवेदसम् । जात । वेदसम् । चरिष्णुधूमम् । चरिष्णु । धूमम् । अगृभीतशोचिषम् । अगृभीत । शोचिषम् ॥१०३॥

Samveda - Mantra Number : 103
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 11;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
हे उपासक ! तू (प्रतीव्यम्) प्रतिपदार्थ में व्याप्त तथा प्रतिपदार्थ की रक्षा करने वाले परमात्मा की (हि) ही (ईडिष्व) स्तुति प्रार्थना-उपासना किया कर । (जातवेदसम्) तथा प्रज्ञा वाले, अर्थात् सर्वज्ञ परमात्मा का ही (यजस्व) यजन किया कर, उस की ही पूजा, उसका सत्संग तथा उस के प्रति सर्वस्व समर्पण किया कर । (चरिष्णुधूमम्) उपासनाकाल में चलायमान जो धूम अर्थात् धुआं दृष्टिगोचर होता है वह जिस परमात्मा की प्राप्ति का पूर्वरूप है, (अगृभीतशोचिषम्) और तदनन्तर जिस परमात्मा की अबाधित ज्योति प्रकट होती है, उसी की स्तुति-प्रार्थना-उपासना किया कर ।
Footnote
[ प्रतीव्यम् = प्रति + वी (व्याप्ति); या प्रति + अव् (रक्षा) । चरिष्णुधूमम् = नीहार, धूम्र, अर्क, अनिल, अनल, खद्योत, विद्युत्, स्फटिक, शशी—अभ्यास में ये पदार्थ मानसिक दृष्टिगोचर होते हैं, जोकि ब्रह्माभिव्यक्ति के पूर्वरूप हैं (श्वेता० उप०, अ० २, ख० १२) तथा मन्त्र संख्या ९ ]