SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1028

1871 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
अ꣡सा꣢वि꣣ सो꣡म꣢ इन्द्र ते꣣ श꣡वि꣢ष्ठ धृष्ण꣣वा꣡ ग꣢हि । आ꣡ त्वा꣢ पृणक्त्विन्द्रि꣣य꣢꣫ꣳ रजः꣣ सू꣢र्यो꣣ न꣢ र꣣श्मि꣡भिः꣢ ॥१०२८॥

अ꣡सा꣢꣯वि । सो꣡मः꣢꣯ । इ꣣न्द्र । ते । श꣡वि꣢꣯ष्ठ । धृ꣣ष्णो । आ꣢ । ग꣣हि । आ꣢ । त्वा꣣ । पृणक्तु । इन्द्रिय꣢म् । र꣡जः꣢꣯ । सू꣡र्यः꣢꣯ । न । र꣣श्मि꣡भिः꣢ ॥१०२८॥

Mantra without Swara
असावि सोम इन्द्र ते शविष्ठ धृष्णवा गहि । आ त्वा पृणक्त्विन्द्रियꣳ रजः सूर्यो न रश्मिभिः ॥

असावि । सोमः । इन्द्र । ते । शविष्ठ । धृष्णो । आ । गहि । आ । त्वा । पृणक्तु । इन्द्रियम् । रजः । सूर्यः । न । रश्मिभिः ॥१०२८॥

Samveda - Mantra Number : 1028
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 7;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(इन्द्र) हे परमेश्वर ! (ते) आपके लिए (सोम) भक्तिरस (असावि) प्रकट हो गया है । (शविष्ठ) हे महाबली !, (धृष्णो) हे आसुरी-भावों का पराभव करने वाले ! (आ गहि) हृदय में प्रकट हूजिये । (त्वा) आप के साथ (इन्द्रियम्) मेरी मन-रूपी-इन्द्रिय, योगविधि द्वारा, (आ पृणक्तु) पूर्णतया सम्पृक्त हो जाय, सम्बद्ध हो जाय, (न) जैसे कि (रश्मिभिः सूर्यः) रश्मियों वाला सूर्य (रजः) पृथिवी के साथ सम्बद्ध है ।
Footnote
[ पृथिवी का सूर्य के साथ दृढ़ सम्बन्ध है । पृथिवी दिन-रात सूर्य की परिक्रमा करती, और सूर्य से शक्ति पाती है । इसी प्रकार जीवात्मा का दृढ़ सम्बन्ध जब परमेश्वर के साथ हो जाता है, तो जीवात्मा की क्रियाशीलता का केन्द्र परमात्मा बन जाता है, और जीवात्मा सदा परमात्मा से शक्ति पाता रहता है । ]