SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1008

1871 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- जमदग्निर्भार्गवः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣡सा꣢व्य꣣ꣳशु꣡र्मदा꣢꣯या꣣प्सु꣡ दक्षो꣢꣯ गिरि꣣ष्ठाः꣢ । श्ये꣣नो꣢꣫ न योनि꣣मा꣡स꣢दत् ॥१००८॥

अ꣡सा꣢꣯वि । अ꣣ꣳशुः꣢ । म꣡दा꣢꣯य । अ꣡प्सु꣢ । द꣡क्षः꣢꣯ । गि꣣रि꣢ष्ठाः । गि꣣रि । स्थाः꣢ । श्ये꣣नः꣢ । न । यो꣡नि꣢꣯म् । आ । अ꣣सदत् ॥१००८॥

Mantra without Swara
असाव्यꣳशुर्मदायाप्सु दक्षो गिरिष्ठाः । श्येनो न योनिमासदत् ॥

असावि । अꣳशुः । मदाय । अप्सु । दक्षः । गिरिष्ठाः । गिरि । स्थाः । श्येनः । न । योनिम् । आ । असदत् ॥१००८॥

Samveda - Mantra Number : 1008
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 6;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
उपासक के (मदाय) हर्ष के लिये (अंशुः) ज्योति (असावि) प्रकट हुई है । यह ज्योति उपासक के (अप्सु) प्राणों और कर्मों में (दक्षः) बल और उत्साह प्रदान करती है, (गिरिष्ठाः) जिस का कि वेदवाणी में वर्णन है । (श्येनः) बाजपक्षी (न) जैसे अपने आश्रय पर ना बैठता है, वैसे उपासक (योनिम्) जगन्माता की गोद में (आ सदत्) आ बैठा है।
Footnote
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