SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1002

1871 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhand- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
इ꣢न्द्रो꣣ म꣡दा꣢य वावृधे꣣ श꣡व꣢से वृत्र꣣हा꣡ नृ꣢꣯भिः । त꣢꣫मिन्म꣣ह꣢त्स्वा꣣जि꣢षू꣣ति꣡मर्भे꣢꣯ हवामहे꣣ स꣡ वाजे꣢꣯षु꣣ प्र꣡ नो꣡ऽविषत् ॥१००२॥

इ꣡न्द्रः꣢꣯ । म꣡दा꣢꣯य । वा꣣वृधे । श꣡व꣢꣯से । वृ꣣त्रहा꣢ । वृ꣡त्र । हा꣡ । नृ꣡भिः꣢꣯ । तम् । इत् । म꣣ह꣡त्सु꣢ । आ꣣जि꣡षु꣢ । ऊ꣣ति꣢म् । अ꣡र्भे꣢꣯ । ह꣣वामहे । सः꣢ । वा꣡जे꣢꣯षु । प्र । नः꣣ । अविषत् ॥१००२॥

Mantra without Swara
इन्द्रो मदाय वावृधे शवसे वृत्रहा नृभिः । तमिन्महत्स्वाजिषूतिमर्भे हवामहे स वाजेषु प्र नोऽविषत् ॥

इन्द्रः । मदाय । वावृधे । शवसे । वृत्रहा । वृत्र । हा । नृभिः । तम् । इत् । महत्सु । आजिषु । ऊतिम् । अर्भे । हवामहे । सः । वाजेषु । प्र । नः । अविषत् ॥१००२॥

Samveda - Mantra Number : 1002
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 5;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(नृभिः) नर-नारियों द्वारा उपासित (इन्द्रः) परमेश्वर, उपासकों के (वृत्रहा) पाप-वृत्रों का हनन करता, और उपासकों की (वावृधे) वृद्धि करता है, और उन्हें (मदाय) आनन्द तथा (शवसे) वल के प्रदान के लिये तत्पर रहता है (तम्) उस (ऊतिम्) रक्षक का (इत्) ही (हवामहे) हम आह्वान करते हैं, (महत्सु) बड़े और (अर्भे) छोटे (आजिषु) देवासुर संग्रामों में । (सः) वह परमेश्वर (वाजेषु) देवासुर संग्रामों में (नः) हम उपासकों की (प्र अविषत्) विशेष रक्षा करता है ।
Footnote
[ महत्सु अर्भे = जब काम, क्रोध, मोह आदि इकट्ठे होकर आक्रमण करें तो यह बड़ा संग्राम है, और एकाध काम आदि आक्रमण करे तो यह छोटा संग्राम है । वाजे = संग्राम (निघं० २। १७) ]