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Samveda Mantra 999

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
य꣡त्सो꣢म चि꣣त्र꣢मु꣣꣬क्थ्यं꣢꣯ दि꣣व्यं꣡ पार्थि꣢꣯वं꣣ व꣡सु꣢ । त꣡न्नः꣢ पुना꣣न꣡ आ भ꣢꣯र ॥९९९॥

य꣢त् । सो꣣म । चित्र꣢म् । उ꣣क्थ्यम्꣢ । दि꣣व्य꣢म् । पा꣡र्थि꣢꣯वम् । व꣡सु꣢꣯ । तत् । नः꣣ । पुनानः꣢ । आ । भ꣣र ॥९९९॥

Mantra without Swara
यत्सोम चित्रमुक्थ्यं दिव्यं पार्थिवं वसु । तन्नः पुनान आ भर ॥

यत् । सोम । चित्रम् । उक्थ्यम् । दिव्यम् । पार्थिवम् । वसु । तत् । नः । पुनानः । आ । भर ॥९९९॥

Samveda - Mantra Number : 999
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 4;

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Meaning
हे (सोम) दिव्य आनन्द, विद्या आदि परम ऐश्वर्य से युक्त जगदीश्वर वा आचार्य ! (यत्) जो (चित्रम्) अद्भुत, (उक्थ्यम्) प्रशंसनीय, (दिव्यम्) योगसिद्धि,मोक्ष आदि दिव्य, तथा (पार्थिवम्) सोना, हीरे, मोती, चक्रवर्त्ती राज्य आदि भौतिक (वसु) धन है, (तत्) उस धन को, आप (नः) हमें (पुनानः) पवित्र करते हुए (आ भर) प्रदान कीजिए ॥१॥
Essence
परमात्मा की कृपा को प्राप्त हुए और आचार्य द्वारा तरह-तरह की आध्यात्मिक तथा भौतिक विद्याओं में पारङ्गत किये हुए हम सकल दिव्य एवं पार्थिव धन को एकत्र कर सकते हैं ॥१॥
Subject
प्रथम मन्त्र में परमात्मा और आचार्य से प्रार्थना की गयी है।

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