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Samveda Mantra 998

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- सप्तर्षयः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
अ꣣नूपे꣢꣫ गोमा꣣न्गो꣡भि꣢रक्षाः꣣ सो꣡मो꣢ दु꣣ग्धा꣡भि꣢रक्षाः । स꣣मुद्रं꣢꣫ न सं꣣व꣡र꣢णान्यग्मन्म꣣न्दी꣡ मदा꣢꣯य तोशते ॥९९८॥

अ꣣नूपे꣢ । गो꣡मा꣢꣯न् । गो꣡भिः꣢꣯ । अ꣣क्षारि꣡ति꣢ । सो꣡मः꣢꣯ । दु꣣ग्धा꣡भिः꣢ । अ꣣क्षारि꣡ति꣢ । स꣣मुद्र꣢म् । स꣣म् । उद्र꣢म् । न । सं꣣व꣡र꣢णानि । स꣣म् । व꣡र꣢꣯णानि । अ꣣ग्मन् । मन्दी꣢ । म꣡दा꣢꣯य । तो꣣शते ॥९९८॥

Mantra without Swara
अनूपे गोमान्गोभिरक्षाः सोमो दुग्धाभिरक्षाः । समुद्रं न संवरणान्यग्मन्मन्दी मदाय तोशते ॥

अनूपे । गोमान् । गोभिः । अक्षारिति । सोमः । दुग्धाभिः । अक्षारिति । समुद्रम् । सम् । उद्रम् । न । संवरणानि । सम् । वरणानि । अग्मन् । मन्दी । मदाय । तोशते ॥९९८॥

Samveda - Mantra Number : 998
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 4;

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Meaning
(यदा) जब (गोमान्) गायों का स्वामी (गोभिः) गायों के साथ (अनूपे) अधिक जलवाले देश में (अक्षाः) निवास करता है, तब (दुग्धाभिः) दुही हुई भी गायों से (सोमः) दूध (अक्षाः) झरता रहता है, अर्थात् गायों में इतना अधिक दूध होता है कि दुह लेने के बाद भी पर्याप्त दूध थनों में बचा होकर चूता रहता है। (समुद्रं न) समुद्र में जैसे (संवरणानि) नदियों के जल पहुँचते हैं, वैसे ही गायों के दूध विशाल कड़ाह आदि में (अग्मन्) जाते हैं। (मन्दी) हर्षदायक गोदुग्ध-रूप सोम (मदाय) गोस्वामियों के हर्ष के लिए (तोशते) दुहने के समय शब्द करता है ॥२॥ यहाँ उपमालङ्कार है। ’रक्षाः’ की आवृत्ति में यमक है ॥२॥
Essence
जिस घर या परिवार में बहुत दूध देनेवाली धेनुएँ हैं, वहाँ के निवासी यथेच्छ गाय के दूध, दही, मक्खन आदि का सेवन करते हुए और गाय के घी से यज्ञ करते हुए तथा परमात्मा का ध्यान करते हुए सदा खूब प्रसन्न रहते हैं ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में दुधारू गायों का वर्णन है।

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