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Samveda Mantra 993

1875 Mantra
Devata- इन्द्राग्नी Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ता꣢भि꣣रा꣡ ग꣢च्छतं न꣣रो꣢पे꣣द꣡ꣳ सव꣢꣯नꣳ सु꣣त꣢म् । इ꣡न्द्रा꣢ग्नी꣣ सो꣡म꣢पीतये ॥९९३॥

ता꣡भिः꣢꣯ । आ । ग꣣च्छतम् । नरा । उ꣡प꣢꣯ । इ꣣द꣢म् । स꣡व꣢꣯नम् । सु꣣त꣢म् । इ꣡न्द्रा꣢꣯ग्नी । इ꣡न्द्र꣢꣯ । अ꣣ग्नीइ꣡ति꣢ । सो꣡म꣢꣯पीतये । सो꣡म꣢꣯ । पी꣣तये ॥९९३॥

Mantra without Swara
ताभिरा गच्छतं नरोपेदꣳ सवनꣳ सुतम् । इन्द्राग्नी सोमपीतये ॥

ताभिः । आ । गच्छतम् । नरा । उप । इदम् । सवनम् । सुतम् । इन्द्राग्नी । इन्द्र । अग्नीइति । सोमपीतये । सोम । पीतये ॥९९३॥

Samveda - Mantra Number : 993
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 3;

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Meaning
हे (नरा) नेता (इन्द्राग्नी) आत्मा और मन एवं राजा और सेनापति ! (इदं सवनम् उप सुतम्) तुम्हारे लिए यह उद्बोधन स्तोत्र गाया गया है। तुम (ताभिः) उन पूर्वमन्त्रोक्त लाख उदात्त कामनाओं के साथ(सोमपीतये) वीररस के पानार्थ (आगच्छतम्) आओ ॥३॥
Essence
मनुष्य के आत्मा में तथा राजा एवं सेनाध्यक्ष में जो बहुत सी महत्त्वाकाङ्क्षाएँ रहती हैं, वे वीरता से ही सिद्ध की जा सकती हैं। आध्यात्मिक उत्कर्ष भी वीरता से ही सम्भव है, आलसीपन से नहीं ॥३॥ इस खण्ड में अग्नि की स्तुति द्वारा परमात्मा की स्तुति का वर्णन करने से, मित्र-वरुण नाम से परमात्मा-जीवात्मा एवं प्राण-अपान का वर्णन होने से, इन्द्र नाम से जीवात्मा को उद्बोधन होने से, इन्द्राग्नी नाम से आत्मा और मन को उद्बोधन होने से तथा प्रसङ्गतः मित्र-वरुण नाम से राष्ट्रपति एवं प्रधानमन्त्री तथा अध्यापक एवं उपदेशक और इन्द्राग्नी नाम से राजा एवं सेनापति के भी कर्त्तव्य आदि कथित होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिए ॥ षष्ठ अध्याय में तृतीय खण्ड समाप्त ॥
Subject
अगले मन्त्र में फिर वही विषय है।

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