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Samveda Mantra 981

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- जमदग्निर्भार्गवः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
त्व꣡ꣳ सो꣢म꣣ प꣡रि꣢ स्रव꣣ स्वा꣡दि꣢ष्ठो꣣ अ꣡ङ्गि꣢रोभ्यः । व꣣रिवोवि꣢द्घृ꣣तं꣡ पयः꣢꣯ ॥९८१॥

त्वम् । सो꣣म । प꣡रि꣢ । स्र꣣व । स्वा꣡दि꣢꣯ष्ठ । अ꣡ङ्गि꣢꣯रोभ्यः । व꣣रिवोवि꣢त् । व꣣रिवः । वि꣢त् । घृ꣣त꣢म् । प꣡यः꣢꣯ ॥९८१॥

Mantra without Swara
त्वꣳ सोम परि स्रव स्वादिष्ठो अङ्गिरोभ्यः । वरिवोविद्घृतं पयः ॥

त्वम् । सोम । परि । स्रव । स्वादिष्ठ । अङ्गिरोभ्यः । वरिवोवित् । वरिवः । वित् । घृतम् । पयः ॥९८१॥

Samveda - Mantra Number : 981
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 2;

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1 Bhashyas
Meaning
हे (सोम) रसागार परमेश्वर ! (स्वादिष्ठः) सबसे अधिक मधुर और (वरिवोवित्) ऐश्वर्य को प्राप्त करानेवाले (त्वम्) आप (अङ्गिरोभ्यः) प्राणायाम के अभ्यासी योगसाधकों के लिए (घृतम्) तेज और (पयः) आनन्दरस को (परि स्रव) क्षरित कीजिए ॥३॥
Essence
जो लोग परमात्मा के ध्यान में मग्न हो जाते हैं, उन्हें वह सर्वाधिक रसीला, सर्वाधिक मधुर और सर्वाधिक तेजस्वी अनुभूत होता है ॥३॥ इस खण्ड में परमात्मा के स्वरूपवर्णनपूर्वक उसकी स्तुति करने, उसका आह्वान करने और उससे आनन्दरस के प्रवाह की प्रार्थना करने के कारण इस खण्ड की पूर्वखण्ड के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिए ॥ षष्ठ अध्याय में द्वितीय खण्ड समाप्त ॥
Subject
आगे फिर वही विषय है।