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Samveda Mantra 98

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- विश्वामित्रो गाथिनः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
प्र꣡ होत्रे꣢꣯ पू꣣र्व्यं꣢꣫ वचो꣣ऽग्न꣡ये꣢ भरता बृ꣣ह꣢त् । वि꣣पां꣡ ज्योती꣢꣯ꣳषि꣣ बि꣡भ्र꣢ते꣣ न꣢ वे꣣ध꣡से꣢ ॥९८॥

प्र꣢ । हो꣡त्रे꣢꣯ । पू꣣र्व्य꣢म् । व꣡चः꣢꣯ । अ꣣ग्न꣡ये꣢ । भ꣣रत । बृह꣢त् । वि꣣पा꣢म् । ज्यो꣡तीँ꣢꣯षि꣣ । बि꣡भ्र꣢꣯ते । न । वे꣣ध꣡से꣢ ॥९८॥

Mantra without Swara
प्र होत्रे पूर्व्यं वचोऽग्नये भरता बृहत् । विपां ज्योतीꣳषि बिभ्रते न वेधसे ॥

प्र । होत्रे । पूर्व्यम् । वचः । अग्नये । भरत । बृहत् । विपाम् । ज्योतीँषि । बिभ्रते । न । वेधसे ॥९८॥

Samveda - Mantra Number : 98
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 11;

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Meaning
हे मनुष्यो ! तुम (विपाम्) मेधावी छात्रों के (ज्योतींषि) विद्या-तेजों को (बिभ्रते) परिपुष्ट करनेवाले, (वेधसे न) द्विज बनाने के लिए द्वितीय जन्म देनेवाले आचार्य के लिए जैसे स्तुति-वचन उच्चारण किये जाते हैं, वैसे ही (विपाम्) व्याप्त सूर्य-चन्द्र, नक्षत्र आदि के (ज्योतींषि) तेजों को (बिभ्रते) परिपुष्ट करनेवाले (वेधसे) जगद्-विधाता, (होत्रे) सुख-समृद्धि-प्रदाता (अग्नये) तेजस्वी परमेश्वर के लिए (बृहत्) महान् (पूर्व्यम्) श्रेष्ठ (वचः) वेद के स्तोत्र को (प्र भरत) प्रकृष्ट रूप से उच्चारण करो ॥२॥ इस मन्त्र में श्लिष्टोपमालङ्कार है ॥२॥
Essence
जैसे कोई विद्वान् शिक्षक अपने उपदेश और शिक्षा से बुद्धिमान् विद्यार्थियों को विद्या-तेज प्रदान करता है, वैसे ही जो परमेश्वर सूर्य-चन्द्र, नक्षत्र, बिजली आदिकों को ज्योति देता है, उस परमैश्वर्यशाली जगदीश्वर में सबको श्रद्धा करनी चाहिए ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में मनुष्यों को परमेश्वर की आराधना करने की प्रेरणा दी गयी है।