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Samveda Mantra 970

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प꣢रि꣣ वि꣡श्वा꣢नि꣣ चे꣡त꣢सा मृ꣣ज्य꣢से꣣ प꣡व꣢से म꣣ती꣡ । स꣡ नः꣢ सोम꣣ श्र꣡वो꣢ विदः ॥९७०॥

प꣡रि꣢꣯ । वि꣡श्वा꣢꣯नि । चे꣡त꣢꣯सा । मृ꣣ज्य꣡से꣢ । प꣡व꣢꣯से । म꣣ती꣢ । सः । नः꣣ । सोम । श्र꣡वः꣢꣯ । वि꣣दः ॥९७०॥

Mantra without Swara
परि विश्वानि चेतसा मृज्यसे पवसे मती । स नः सोम श्रवो विदः ॥

परि । विश्वानि । चेतसा । मृज्यसे । पवसे । मती । सः । नः । सोम । श्रवः । विदः ॥९७०॥

Samveda - Mantra Number : 970
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 2;

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Meaning
हे परमात्मन् ! (विश्वानि) सब सांसारिक भोगविलास आदि को (परि) छोड़कर, आप ही हमारे द्वारा(चेतसा) चित्त से और (मती) मति से (मृज्यसे)अलंकृत किये जा रहे हो, क्योंकि आप हमें (पवसे) पवित्र करते हो। हे (सोम) परमैश्वर्यशालिन् ! (सः) वह आप (नः) हमें (श्रवः) यश (विदः) प्राप्त कराओ ॥३॥
Essence
जब मनुष्य बाह्य विषयों से मन को हटाकर और परमात्मा में ही केन्द्रित करके परमात्मा का ध्यान करता है, तब वह उसे अत्यधिक पवित्रता और अविनश्वर यश प्रदान करता है ॥३॥
Subject
अगले मन्त्र में परमात्मा से प्रार्थना की गयी है।

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