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Samveda Mantra 967

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
शु꣡चिः꣢ पाव꣣क꣡ उ꣢च्यते꣣ सो꣡मः꣢ सु꣣तः꣡ स मधु꣢꣯मान् । दे꣣वावी꣡र꣢घशꣳस꣣हा꣢ ॥९६७॥

शु꣡चिः꣢꣯ । पा꣣वकः꣢ । उ꣣च्यते । सो꣡मः꣢꣯ । सु꣣तः꣢ । सः । म꣡धु꣢꣯मान् । दे꣣वावीः꣢ । दे꣣व । अवीः꣢ । अ꣣घशꣳसहा꣢ । अ꣣घशꣳस । हा꣢ ॥९६७॥

Mantra without Swara
शुचिः पावक उच्यते सोमः सुतः स मधुमान् । देवावीरघशꣳसहा ॥

शुचिः । पावकः । उच्यते । सोमः । सुतः । सः । मधुमान् । देवावीः । देव । अवीः । अघशꣳसहा । अघशꣳस । हा ॥९६७॥

Samveda - Mantra Number : 967
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 1;

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1 Bhashyas
Meaning
(सुतः) अभिषुत किया गया (स सोमः) वह रसों का भण्डार परमेश्वर (शुचिः) पवित्र, (पावकः) पवित्र करनेवाला, (मधुमान्) मधुर, (देवावीः) दिव्यगुणी विद्वानों की रक्षा करनेवाला और (अघशंसहा) पापप्रशंसकों का विनाशक (उच्यते) कहा जाता है ॥७॥
Essence
स्तुति और उपासना से प्रसन्न किया गया परमेश्वर परम आनन्द के समूह को प्रवाहित करता हुआ उपासकों द्वारा अत्यन्त मधुर और पापों का उन्मूलन करनेवाला अनुभव किया जाता है ॥७॥ इस खण्ड में परमात्मा के स्वरूपवर्णनपूर्वक उसकी स्तुति-प्रार्थना-उपासना का और ब्रह्मानन्द का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्वखण्ड के साथ सङ्गति है ॥ षष्ठ अध्याय में प्रथम खण्ड समाप्त ॥
Subject
अगले मन्त्र में परमेश्वर कैसा है, यह बताया गया है।