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Samveda Mantra 96

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
त्व꣡म꣢ग्ने꣣ व꣡सू꣢ꣳरि꣣ह꣢ रु꣣द्रा꣡ꣳ आ꣢दि꣣त्या꣢ꣳ उ꣣त꣢ । य꣡जा꣢ स्वध्व꣣रं꣢꣫ जनं꣣ म꣡नु꣢जातं घृत꣣प्रु꣡ष꣢म् ॥९६॥

त्व꣢म् । अ꣣ग्ने । व꣡सू꣢꣯न् । इ꣣ह꣢ । रु꣣द्रा꣢न् । आ꣣दित्या꣢न् । आ꣣ । दित्या꣢न् । उ꣣त꣢ । य꣡ज꣢꣯ । स्व꣣ध्वर꣢म् । सु꣣ । अध्वर꣢म् । ज꣡न꣢꣯म् । म꣡नु꣢꣯जातम् । म꣡नु꣢꣯ । जा꣣तम् । घृ꣣तप्रु꣡ष꣢म् । घृ꣣त । प्रु꣡ष꣢꣯म् ॥९६॥

Mantra without Swara
त्वमग्ने वसूꣳरिह रुद्राꣳ आदित्याꣳ उत । यजा स्वध्वरं जनं मनुजातं घृतप्रुषम् ॥

त्वम् । अग्ने । वसून् । इह । रुद्रान् । आदित्यान् । आ । दित्यान् । उत । यज । स्वध्वरम् । सु । अध्वरम् । जनम् । मनुजातम् । मनु । जातम् । घृतप्रुषम् । घृत । प्रुषम् ॥९६॥

Samveda - Mantra Number : 96
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 10;

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) परमात्मन् ! (त्वम्) जगदीश्वर आप (इह) हमारे इस राष्ट्र में (वसून्) धन-धान्य आदि सम्पत्ति से अन्य वर्णों को बसानेवाले उत्कृष्ट वैश्यों को, (रुद्रान्) शत्रुओं को रुलानेवाले वीर क्षत्रियों को, (आदित्यान्) प्रकाशित सूर्यकिरणों के समान विद्याप्रकाश से युक्त ब्राह्मणों को, (उत) और (स्वध्वरम्) शुभ यज्ञ करनेवाले, (मनुजातम्) मनुष्य-समाज के कल्याणार्थ जन्म लेनेवाले, (घृतप्रुषम्) यज्ञाग्नि में अथवा सत्पात्रों में घृत आदि को सींचनेवाले (जनम्) पुत्र को (यज) प्रदान कीजिए ॥६॥ अब वसुओं, रुद्रों और आदित्यों के उपर्युक्त अर्थ करने में प्रमाण लिखते हैं। वसवः से वैश्यजन गृहीत होते हैं, क्योंकि यजुर्वेद ८।१८ में वसुओं से धन की याचना की गयी है। रुद्रों से क्षत्रिय अभिप्रेत हैं, क्योंकि रुद्रों का वर्णन वेदों में इस रूप में मिलता है—हे रुद्र, तेरी सेनाएँ हमसे भिन्न हमारे शत्रु को विनष्ट करें (ऋ० २।३३।११); उस रुद्र के सम्मुख अपनी वाणियों को प्रेरित करो, जिसके पास स्थिर धनुष् है, वेगगामी बाण हैं, जो स्वयं आत्म-रक्षा करने में समर्थ है, किसी से पराजित नहीं होता, शत्रुओं का पराजेता है और तीव्र शस्त्रास्त्रों से युक्त है’ (ऋ० ७।४६।१)। आदित्यों से ब्राह्मण ग्राह्य हैं, क्योंकि तै० संहिता में कहा है कि ब्राह्मण ही आदित्य हैं (तै० सं० १।१।९।८) ॥६॥
Essence
हे जगत्-साम्राज्य के संचालक, देवाधिदेव, परमपिता परमेश्वर ! ऐसी कृपा करो कि हमारे राष्ट्र में धन-दान से सब वर्णाश्रमों का पालन करनेवाले उत्तम कोटि के वैश्य, युद्धों में शत्रुओं को जीतनेवाले वीर क्षत्रिय और आदित्य के समान ज्ञान-प्रकाश से पूर्ण विद्वद्वर ब्राह्मण उत्पन्न हों और सब लोग तरह-तरह के परोपकार-रूप यज्ञों का अनुष्ठान करनेवाली, मानवसमाज का कल्याण करनेवाली, अग्निहोत्र-परायण, अतिथियों का घृतादि से सत्कार करनेवाली सुयोग्य सन्तान को प्राप्त करें ॥६॥ इस दशति में सोम, अग्नि, वरुण, विष्णु आदि विविध नामों से परमेश्वर का स्मरण होने से, परमेश्वर के आश्रय से अंगिरस योगियों की उत्कर्ष-प्राप्ति का वर्णन होने से, परमेश्वर के गुणों का वर्णन करते हुए उससे राक्षसों के संहार तथा राष्ट्रोत्थान के लिए प्रार्थना करने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ संगति है। प्रथम प्रपाठक में द्वितीय अर्ध की पाँचवीं दशति समाप्त। यह प्रथम प्रपाठक समाप्त हुआ ॥ प्रथम अध्याय में दशम खण्ड समाप्त ॥
Subject
अगले मन्त्र में राष्ट्रवासी जन परमात्मा से प्रार्थना कर रहे हैं।