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Samveda Mantra 958

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- कश्यपो मारीचः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प꣡व꣢मानस्य विश्ववि꣣त्प्र꣢ ते꣣ स꣡र्गा꣢ असृक्षत । सू꣡र्य꣢स्येव꣣ न꣢ र꣣श्म꣡यः꣢ ॥९५८॥

प꣡वमा꣢꣯नस्य । वि꣣श्ववित् । विश्व । वित् । प्र꣢ । ते꣣ । स꣡र्गाः꣢꣯ । अ꣣सृक्षत । सू꣡र्य꣢꣯स्य । इ꣣व । न꣢ । र꣣श्म꣡यः꣢ ॥९५८॥

Mantra without Swara
पवमानस्य विश्ववित्प्र ते सर्गा असृक्षत । सूर्यस्येव न रश्मयः ॥

पवमानस्य । विश्ववित् । विश्व । वित् । प्र । ते । सर्गाः । असृक्षत । सूर्यस्य । इव । न । रश्मयः ॥९५८॥

Samveda - Mantra Number : 958
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 1;

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Meaning
हे (विश्ववित्) सर्वज्ञ, सर्वान्तर्यामिन् जगदीश्वर ! (पवमानस्य) पवित्रता देनेवाले (ते) आपकी (सर्गाः) पावन आनन्दधाराएँ (न) इस समय (सूर्यस्य) सूर्य की (रश्मयः इव) किरणों के समान (प्र असृक्षत) छूट रही हैं ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
Essence
परमात्मा की सर्वज्ञता और सर्वव्यापकता का विचार करके मनुष्यों को पाप-विचारों तथा पाप-कर्मों से स्वयं को हटाकर सदा पवित्र अन्तःकरणवाला होना चाहिए ॥१॥
Subject
प्रारम्भ में परमात्मा का विषय कहते हैं।

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