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Samveda Mantra 950

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
न꣢ कि꣣ष्ट्व꣢द्र꣣थी꣡त꣢रो꣣ ह꣢री꣣ य꣡दि꣢न्द्र꣣ य꣡च्छ꣢से । न꣢ कि꣣ष्ट्वा꣡नु꣢ म꣣ज्म꣢ना꣣ न꣢ किः꣣ स्व꣡श्व꣢ आनशे ॥९५०॥

न । किः꣣ । त्व꣢त् । र꣣थी꣡त꣢रः । हरी꣢꣯इ꣡ति꣢ । यत् । इ꣣न्द्र । य꣡च्छ꣢꣯से । न । किः꣣ । त्वा । अ꣡नु꣢꣯ । म꣣ज्म꣡ना꣢ । न । किः꣣ । स्व꣡श्वः꣢꣯ । सु꣣ । अ꣡श्वः꣢꣯ । आ꣡नशे ॥९५०॥

Mantra without Swara
न किष्ट्वद्रथीतरो हरी यदिन्द्र यच्छसे । न किष्ट्वानु मज्मना न किः स्वश्व आनशे ॥

न । किः । त्वत् । रथीतरः । हरीइति । यत् । इन्द्र । यच्छसे । न । किः । त्वा । अनु । मज्मना । न । किः । स्वश्वः । सु । अश्वः । आनशे ॥९५०॥

Samveda - Mantra Number : 950
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 6;

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Meaning
हे (इन्द्र) विघ्नों को विदीर्ण करनेवाले जीवात्मन् ! (न किः) कोई भी नहीं (त्वत्) तेरी अपेक्षा (रथीतरः) अधिक प्रशस्त रथारोही है, (यत्) क्योंकि, तू (हरी) ज्ञानेन्द्रिय-कर्मेन्द्रिय-रूप घोड़ों को (यच्छसे)शरीररूप रथ में नियन्त्रित किये रखता है। (न किः) कोई भी नहीं (त्वा) तेरी (मज्मना) बल में (अनु) बराबरी करता है। (न किः) कोई भी नहीं (स्वश्वः) उत्कृष्ट घोड़ोंवाला भी (आनशे) तेरे बराबर हो सकता है ॥२॥
Essence
प्रोद्बोधन दिया हुआ जीवात्मा जब वीररस को अपने अन्दर सञ्चारित करता है तब कोई भी अन्य उसकी बराबरी नहीं कर सकता ॥२॥
Subject
पुनः जीवात्मा को सम्बोधन किया गया है।

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