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Samveda Mantra 946

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- प्रयोगो भार्गवः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣣ग्निं꣡ वो꣢ वृ꣣ध꣡न्त꣢मध्व꣣रा꣡णां꣢ पुरू꣣त꣡म꣢म् । अ꣢च्छा꣣ न꣢प्त्रे꣣ स꣡ह꣢स्वते ॥९४६॥

अ꣣ग्नि꣢म् । वः꣣ । वृध꣡न्त꣢म् । अ꣣ध्वरा꣡णा꣢म् । पु꣣रूत꣡म꣢म् । अ꣡च्छ꣢꣯ । न꣡प्त्रे꣢꣯ । स꣡ह꣢꣯स्वते ॥९४६॥

Mantra without Swara
अग्निं वो वृधन्तमध्वराणां पुरूतमम् । अच्छा नप्त्रे सहस्वते ॥

अग्निम् । वः । वृधन्तम् । अध्वराणाम् । पुरूतमम् । अच्छ । नप्त्रे । सहस्वते ॥९४६॥

Samveda - Mantra Number : 946
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 6;

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! तुम (वः) तुम्हें (वृधन्तम्) बढ़ानेवाले, (अध्वराणाम्) यज्ञों के अर्थात् परोपकारार्थ किये जानेवाले कर्मों के (पुरुतमम्) अतिशय पूरक, (अग्निम्)ज्ञानप्रकाशक परमेश्वर की उपासना करो। (नप्त्रे) पतित न होने देनेवाले, अपितु उठानेवाले, (सहस्वते) बलवान् उस परमेश्वर के (अच्छ) अभिमुख होवो ॥१॥
Essence
सबको चाहिए कि शुभ कर्मों में उत्साहित करनेवाले, दुष्कर्मों से निवारण करनेवाले, बलवान्, उत्कर्षकारी, बलप्रदाता परमेश्वर की नित्य उपासना करें ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा की पूर्वार्चिक में २१ क्रमाङ्क पर परमात्मा के विषय में व्याख्या की जा चुकी है। यहाँ भी प्रकारान्तर से वही विषय दर्शाया जा रहा है।