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Samveda Mantra 942

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अग्निश्चाक्षुषः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
अ꣡स꣢र्जि क꣣ल꣡शा꣢ꣳ अ꣣भि꣢ मी꣣ढ्वा꣢꣫न्त्सप्ति꣣र्न꣡ वा꣢ज꣣युः꣢ । पु꣣नानो꣡ वाचं꣢꣯ ज꣣न꣡य꣢न्नसिष्यदत् ॥९४२॥

अ꣡स꣢꣯र्जि । क꣣ल꣡शा꣢न् । अ꣣भि꣢ । मी꣣ढ्वा꣢न् । स꣡प्तिः꣢꣯ । न । वा꣣ज꣢युः । पु꣣नानः꣢ । वा꣡च꣢꣯म् । ज꣣न꣡य꣢न् । अ꣣सिष्यदत् ॥९४२॥

Mantra without Swara
असर्जि कलशाꣳ अभि मीढ्वान्त्सप्तिर्न वाजयुः । पुनानो वाचं जनयन्नसिष्यदत् ॥

असर्जि । कलशान् । अभि । मीढ्वान् । सप्तिः । न । वाजयुः । पुनानः । वाचम् । जनयन् । असिष्यदत् ॥९४२॥

Samveda - Mantra Number : 942
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 6;

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1 Bhashyas
Meaning
(मीढ्वान्) आनन्दरस को सींचनेवाला, (वाजयुः) स्तोताओं को आत्मबल देने का इच्छुक पवमान सोम अर्थात् पवित्रकर्ता रसनिधि परमेश्वर (कलशान् अभि) अन्नमय-प्राणमय-मनोमय आदि कोशों को लक्ष्य करके (असर्जि) छोड़ा गया है, (सप्तिः न) जैसे घोड़ा संग्राम को लक्ष्य करके छोड़ा जाता है। (पुनानः) पवित्रता देता हुआ वह (वाचं जनयन्) उपदेश-वाणी को उत्पन्न करता हुआ (असिष्यदत्) अन्तरात्मा में प्रवाहित हो रहा है ॥३॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥३॥
Essence
परमात्मा की उपासना से आनन्दरस, आत्मबल, अन्तःकरण की पवित्रता और आत्मोत्थान का सन्देश प्राप्त होता है ॥३॥
Subject
अगले मन्त्र में पुनः परमात्मा का विषय है।