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Samveda Mantra 940

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अग्निश्चाक्षुषः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
सो꣡मः꣢ पुना꣣न꣢ ऊ꣣र्मि꣢꣫णाव्यं꣣ वा꣢रं꣣ वि꣡ धा꣢वति । अ꣡ग्रे꣢ वा꣣चः꣡ पव꣢꣯मानः꣣ क꣡नि꣢क्रदत् ॥९४०॥

सो꣡मः꣢꣯ । पु꣣नानः꣢ । ऊ꣣र्मि꣡णा꣢ । अ꣡व्य꣢꣯म् । वा꣡र꣢꣯म् । वि । धा꣣वति । अ꣡ग्रे꣢꣯ । वा꣣चः꣢ । प꣡व꣢꣯मानः । क꣡नि꣢꣯क्रदत् ॥९४०॥

Mantra without Swara
सोमः पुनान ऊर्मिणाव्यं वारं वि धावति । अग्रे वाचः पवमानः कनिक्रदत् ॥

सोमः । पुनानः । ऊर्मिणा । अव्यम् । वारम् । वि । धावति । अग्रे । वाचः । पवमानः । कनिक्रदत् ॥९४०॥

Samveda - Mantra Number : 940
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 6;

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1 Bhashyas
Meaning
(सोमः) रसनिधि परमेश्वर (ऊर्मिणा) आनन्दरस की तरङ्ग से (पुनानः) पवित्र करता हुआ (अव्यम्) अविनश्वर (वारम्) वरणीय आत्मा के प्रति (वि धावति) वेग से जाता है। वह (वाचः) स्तुतिवाणी से (अग्रे) पूर्व ही (पवमानः) बहता हुआ (कनिक्रदत्) कल-कल शब्द करता है ॥१॥ यहाँ ब्रह्मानन्दरस प्रवाह में कारणभूत स्तुतिवाणी के प्रयोग से पहले ही ब्रह्मानन्द का प्रवाह वर्णित होने से ‘कारण से पूर्व कार्योदय होना रूप’ अतिशयोक्ति अलङ्कार है। साथ ही वस्तुतः ब्रह्मानन्द-प्रवाह में लहर और कलकल शब्द न होने पर भी उसमें लहर और कलकल शब्द का सम्बन्ध कथित होने से असम्बन्ध में सम्बन्धरूप अतिशयोक्ति भी है ॥१॥
Essence
परमात्मा के ध्यान में मग्न स्तोता परमात्मा के पास से झरती हुई आनन्द की तरङ्गिणी को अपने अन्दर प्रविष्ट होते हुए अनुभव करके कृतार्थ हो जाता है ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में ५७२ क्रमाङ्क पर ब्रह्मानन्द-रस के विषय में व्याख्यात हो चुकी है। यहाँ वही विषय प्रकारान्तर से दर्शाया जा रहा है।