Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Samveda Mantra 94

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- सोमाहुतिर्भार्गवः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
द꣣धन्वे꣢ वा꣣ य꣢दी꣣म꣢नु꣣ वो꣢च꣣द्ब्र꣢꣫ह्मेति꣣ वे꣢रु꣣ त꣢त् । प꣢रि꣣ वि꣡श्वा꣢नि꣣ का꣡व्या꣢ ने꣣मि꣢श्च꣣क्र꣡मि꣢वाभुवत् ॥९४॥

द꣣धन्वे꣢ । वा꣣ । य꣢त् । ई꣣म् । अ꣡नु꣢꣯ । वो꣡च꣢꣯त् । ब्र꣡ह्म꣢꣯ । इ꣡ति꣢꣯ । वेः । उ꣣ । त꣢त् । प꣡रि꣢꣯ । वि꣡श्वा꣢꣯नि꣣ । का꣡व्या꣢꣯ । ने꣣मिः꣢ । च꣣क्र꣢म् इ꣣व । अभुवत् ॥९४॥

Mantra without Swara
दधन्वे वा यदीमनु वोचद्ब्रह्मेति वेरु तत् । परि विश्वानि काव्या नेमिश्चक्रमिवाभुवत् ॥

दधन्वे । वा । यत् । ईम् । अनु । वोचत् । ब्रह्म । इति । वेः । उ । तत् । परि । विश्वानि । काव्या । नेमिः । चक्रम् इव । अभुवत् ॥९४॥

Samveda - Mantra Number : 94
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 10;

Bhashya

More bhashyas
Meaning
(यत्) जब, उपासक (ईम्) इस परमात्मा-रूप अग्नि को (अनु दधन्वे) अनुकूलतापूर्वक अपने हृदय में धारण कर लेता है, (वा) और (ब्रह्म इति) यह साक्षात् ब्रह्म है, ऐसा (वोचत्) कह सकता है, (तत् उ) तभी, वह उसे (वेः) जानता है, जो परमात्मा रूप अग्नि (विश्वानि) सब (काव्या) वेद-काव्यों अथवा सृष्टि-काव्यों को (परि अभुवत्) चारों ओर व्याप्त किये हुए है, (नेमिः) रथ के पहिए की परिधि (चक्रम् इव) जैसे रथ के पहिए को चारों ओर व्याप्त किये होती है ॥४॥ इस मन्त्र में नेमिश्चक्रमिव में उपमालङ्कार है ॥४॥
Essence
जब परमात्मा के ध्यान में संलग्न योगी परमात्मा को धारणा, ध्यान, समाधि के मार्ग से अपने हृदय के अन्दर भली-भाँति धारण कर लेता है और हस्तामलकवत् उसकी अनुभूति करता हुआ यह ब्रह्म है, जिसका मैं साक्षात् कर रहा हूँ, इस प्रकार कहने में समर्थ होता है, तभी वस्तुतः उसने ब्रह्म जान लिया है, यह मानना चाहिए ॥४॥
Subject
अगले मन्त्र में यह वर्णन है कि कौन परमेश्वर को जानता है।

We are thankful to https://vedicscriptures.in for providing us a substantial amount of data for this section of the Vedas.