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Samveda Mantra 926

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- बृहन्मतिराङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
नू꣡ नो꣢ र꣣यिं꣢ म꣣हा꣡मि꣢न्दो꣣ऽस्म꣡भ्य꣢ꣳ सोम वि꣣श्व꣡तः꣢ । आ꣡ प꣢वस्व सह꣣स्रि꣡ण꣢म् ॥९२६॥

नु꣢ । नः꣣ । रयि꣢म् । म꣣हा꣢म् । इ꣣न्दो । अस्म꣡भ्य꣢म् । सोम । वि꣣श्व꣡तः꣢ । आ । प꣣वस्व । सहस्रि꣡ण꣢म् ॥९२६॥

Mantra without Swara
नू नो रयिं महामिन्दोऽस्मभ्यꣳ सोम विश्वतः । आ पवस्व सहस्रिणम् ॥

नु । नः । रयिम् । महाम् । इन्दो । अस्मभ्यम् । सोम । विश्वतः । आ । पवस्व । सहस्रिणम् ॥९२६॥

Samveda - Mantra Number : 926
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 4;

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Meaning
हे (इन्दो) तेजस्वी तथा आनन्दरस वा विद्यारस से आर्द्र करनेवाले (सोम) शुभगुणप्रेरक परमात्मन् वा आचार्य ! आप (नु) निश्चय से (अस्मभ्यम्) हमारे लिए (विश्वतः)सब ओर से (महाम्) महान्, (सहस्रिणम्) हजार की संख्यावाले (रयिम्) धन, धान्य, विद्या, आरोग्य, सच्चरित्रता, न्याय, दया आदि ऐश्वर्य को (आ पवस्व) प्राप्त कराओ ॥३॥
Essence
परमात्मा की कृपा से और आचार्य के प्रयत्न से मनुष्य सभी आध्यामिक और भौतिक सम्पत्ति को प्राप्त कर सकते हैं ॥३॥ इस खण्ड में गुरु-शिष्य के विषय तथा परमात्मा के विषय का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ पञ्चम अध्याय में चतुर्थ खण्ड समाप्त ॥
Subject
अगले मन्त्र में परमात्मा और आचार्य से प्रार्थना की गयी है।

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