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Samveda Mantra 924

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- बृहन्मतिराङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
पु꣣नानो꣡ अ꣢क्रमीद꣣भि꣢꣫ विश्वा꣣ मृ꣢धो꣣ वि꣡च꣢र्षणिः । शु꣣म्भ꣢न्ति꣣ वि꣡प्रं꣢ धी꣣ति꣡भिः꣢ ॥९२४॥

पु꣣ना꣢नः । अ꣣क्रमीत् । अभि꣢ । वि꣡श्वाः꣢꣯ । मृ꣡धः꣢꣯ । वि꣡च꣢꣯र्षणिः । वि । च꣣र्षणिः । शुम्भ꣡न्ति꣢ । वि꣡प्र꣢꣯म् । वि । प्र꣣म् । धी꣡तिभिः꣢ ॥९२४॥

Mantra without Swara
पुनानो अक्रमीदभि विश्वा मृधो विचर्षणिः । शुम्भन्ति विप्रं धीतिभिः ॥

पुनानः । अक्रमीत् । अभि । विश्वाः । मृधः । विचर्षणिः । वि । चर्षणिः । शुम्भन्ति । विप्रम् । वि । प्रम् । धीतिभिः ॥९२४॥

Samveda - Mantra Number : 924
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 4;

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1 Bhashyas
Meaning
(पुनानः) मनों को शुद्ध करता हुआ (विचर्षणिः)सब शास्त्रों का पार-द्रष्टा सोम आचार्य, शिष्यों की (विश्वाः मृधः) सब हिंसावृत्तियों को (अभि अक्रमीत्) विनष्ट कर देता है। उस (विप्रम्) मेधावी ब्राह्मण आचार्य को, शिष्यगण (धीतिभिः) शिष्यों के योग्य कर्मों द्वारा (शुम्भन्ति) शोभित करते हैं, अर्थात् उससे बताये हुए कर्मों को करते हुए उसके गौरव को बढ़ाते हैं ॥१॥
Essence
जैसे आचार्य शिष्यों के दोषों का परिमार्जन करके उन्हें निष्पाप करता है, वैसे ही शिष्यों को भी चाहिए कि वे आचार्य के आदेश को शिरोधार्य करके उसे प्रसन्न करें ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा का परमात्मा विषयक अर्थ पूर्वार्चिक में ४८८ क्रमाङ्क पर देखना चाहिए। यहाँ आचार्य-शिष्य का विषय वर्णित है।