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Samveda Mantra 918

1875 Mantra
Devata- इन्द्राग्नी Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
मा꣡ पा꣢प꣣त्वा꣡य꣢ नो न꣣रे꣡न्द्रा꣢ग्नी꣣ मा꣡भिश꣢꣯स्तये । मा꣡ नो꣢ रीरधतं नि꣣दे꣢ ॥९१८॥

मा । पा꣣पत्वा꣡य꣢ । नः꣣ । नरा । इ꣡न्द्रा꣢꣯ग्नी । इ꣡न्द्र꣢꣯ । अ꣣ग्नीइ꣡ति꣢ । मा । अ꣣भि꣡श꣢स्तये । अ꣣भि꣢ । श꣣स्तये । मा꣢ । नः꣣ । रीरधतम् । निदे꣢ ॥९१८॥

Mantra without Swara
मा पापत्वाय नो नरेन्द्राग्नी माभिशस्तये । मा नो रीरधतं निदे ॥

मा । पापत्वाय । नः । नरा । इन्द्राग्नी । इन्द्र । अग्नीइति । मा । अभिशस्तये । अभि । शस्तये । मा । नः । रीरधतम् । निदे ॥९१८॥

Samveda - Mantra Number : 918
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 3;

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Meaning
हे (इन्द्राग्नी) आत्मा और मन ! (नरा) नेतृत्व करनेवाले तुम दोनों (मा) न तो (पापत्वाय) पाप कर्म के, (मा) न (अभिशस्तये) हिंसा के और (मा) न ही (नः) हमें (निदे) निन्दक के (रीरधतम्) वश में करो ॥३॥
Essence
मनुष्यों को चाहिए कि आत्मा और मन को उद्बोधन देकर पाप, हिंसा, निन्दा आदि से मुक्ति पायें ॥३॥ इस खण्ड में परमेश्वर के स्वरूप, परमेश्वर-स्तुति, परमात्म-प्राप्ति, आत्मा-मन तथा प्रसङ्गतः राजा और प्रधानमन्त्री का विषय वर्णित होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति जाननी चाहिए ॥ पञ्चम अध्याय में तृतीय खण्ड समाप्त ॥
Subject
आगे आत्मा और मन से प्रार्थना करते हैं।