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Samveda Mantra 910

1875 Mantra
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣣यं꣡ वां꣢ मित्रावरुणा सु꣣तः꣡ सोम꣢꣯ ऋतावृधा । म꣢꣫मेदि꣣ह꣡ श्रु꣢त꣣ꣳ ह꣡व꣢म् ॥९१०॥

अ꣣य꣢म् । वा꣣म् । मित्रा । मि । त्रा । वरुणा । सुतः꣢ । सो꣡मः꣢꣯ । ऋ꣣तावृधा । ऋत । वृधा । म꣡म꣢꣯ । इत् । इ꣣ह꣢ । श्रु꣣तम् ह꣡व꣢꣯म् ॥९१०॥

Mantra without Swara
अयं वां मित्रावरुणा सुतः सोम ऋतावृधा । ममेदिह श्रुतꣳ हवम् ॥

अयम् । वाम् । मित्रा । मि । त्रा । वरुणा । सुतः । सोमः । ऋतावृधा । ऋत । वृधा । मम । इत् । इह । श्रुतम् हवम् ॥९१०॥

Samveda - Mantra Number : 910
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 3;

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Meaning
प्रथम—आत्मा और मन के पक्ष में। हे (ऋतावृधा) सत्य को बढ़ानेवाले (मित्रावरुणा) आत्मा और मन ! (वाम्) तुम दोनों के लिए (अयम्) यह (सोमः) ज्ञान एवं कर्म का रस (सुतः) अभिषुत है। तुम दोनों (इह) यहाँ (मम) मेरे (हवम्) उद्बोधन को (श्रुतम्) सुनो ॥ द्वितीय—राजा और प्रधानमन्त्री के पक्ष में। हे (ऋतावृधा) न्याय को बढ़ानेवाले (मित्रावरुणा) राजा और प्रधानमन्त्री ! (वाम्) तुम दोनों के लिए (अयम्) यह (सोमः) राजकर (सुतः) अर्पित है। तुम दोनों (इह) इस राष्ट्र में (मम) मेरे (हवम्) राष्ट्रोन्नति के आह्वान को (श्रुतम्) सुनो ॥१॥ यहाँ श्लेषालङ्कार है ॥१॥
Essence
मनुष्यों को चाहिए कि अपने आत्मा और मन को उद्बोधन देकर सब प्रकार का उत्कर्ष सिद्ध करें। इसीप्रकार राजा और प्रधानमन्त्री का कर्तव्य है कि वे प्रजाओं से राजकर लेकर प्रजा के हित के लिए उसे व्यय करें ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा में आत्मा और मन तथा राष्ट्रपति और प्रधानमन्त्री का विषय कहते हैं।

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