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Samveda Mantra 906

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- भृगुर्वारुणिर्जमदग्निर्भार्गवो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
आ꣡ प꣢वमान सुष्टु꣣तिं꣢ वृ꣣ष्टिं꣢ दे꣣वे꣢भ्यो꣣ दु꣡वः꣢ । इ꣣षे꣡ प꣢वस्व सं꣣य꣡त꣢म् ॥९०६॥

आ꣢ । प꣣वमान । सुष्टुति꣢म् । सु꣣ । स्तुति꣢म् । वृ꣣ष्टि꣢म् । दे꣣वे꣡भ्यः꣢ । दु꣡वः꣢꣯ । इ꣣षे꣢ । प꣣वस्व । सं꣡यत꣢म् । स꣣म् । य꣡त꣢꣯म् ॥९०६॥

Mantra without Swara
आ पवमान सुष्टुतिं वृष्टिं देवेभ्यो दुवः । इषे पवस्व संयतम् ॥

आ । पवमान । सुष्टुतिम् । सु । स्तुतिम् । वृष्टिम् । देवेभ्यः । दुवः । इषे । पवस्व । संयतम् । सम् । यतम् ॥९०६॥

Samveda - Mantra Number : 906
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 2;

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Meaning
हे (पवमान) चित्तशोधक परमेश्वर ! आप (देवेभ्यः) हम प्रकाशयुक्त उपासकों के लिए (इषे) अभीष्टसिद्धि के अर्थ (सुष्टुतिम्) शुभ स्तुतियुक्त अर्थात् सुप्रशंसित (वृष्टिम्) आनन्दवर्षा को, (दुवः) सेवा की भावना को और (संयतम्) संयम की भावना को (आ पवस्व) प्राप्त कराइये ॥३॥
Essence
उपासकों को परमेश्वर की उपासना से परम आनन्द, दीनों की सेवा में रस और विषयों से मन तथा इन्द्रियों का निग्रह प्राप्त होता है ॥३॥ इस खण्ड में परमेश्वर का तथा उससे प्राप्त होनेवाले ब्रह्मानन्द का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ पञ्चम अध्याय में द्वितीय खण्ड समाप्त ॥
Subject
अब परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं।

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