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Samveda Mantra 899

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- बृहन्मतिराङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प꣣रिष्कृण्व꣡न्ननि꣢꣯ष्कृतं꣣ ज꣡ना꣢य या꣣त꣢य꣣न्नि꣡षः꣢ । वृ꣣ष्टिं꣢ दि꣣वः꣡ परि꣢꣯ स्रव ॥८९९॥

प꣣रिष्कृण्व꣢न् । प꣣रि । कृण्व꣢न् । अ꣡नि꣢꣯ष्कृतम् । अ । नि꣣ष्कृतम् । ज꣡ना꣢य । या꣣त꣡य꣢न् । इ꣡षः꣢꣯ । वृ꣣ष्टि꣢म् । दि꣣वः꣢ । प꣡रि꣢꣯ । स्र꣣व ॥८९९॥

Mantra without Swara
परिष्कृण्वन्ननिष्कृतं जनाय यातयन्निषः । वृष्टिं दिवः परि स्रव ॥

परिष्कृण्वन् । परि । कृण्वन् । अनिष्कृतम् । अ । निष्कृतम् । जनाय । यातयन् । इषः । वृष्टिम् । दिवः । परि । स्रव ॥८९९॥

Samveda - Mantra Number : 899
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 2;

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1 Bhashyas
Meaning
हे पवमान सोम अर्थात् पवित्रतादायक रसागार परमेश्वर ! आप (अनिष्कृतम्) अपरिष्कृत हृदय को (परिष्कृण्वन्) परिष्कृत करते हुए और (जनाय) उपासक मनुष्य के लिए (इषः) आक्रमणकारी विघ्नों की (यातयन्) हिंसा करते हुए (दिवः) आनन्दमय कोश से (वृष्टिम्) आनन्दरस की वर्षा (परि स्रव) प्रवाहित कीजिए ॥२॥
Essence
जैसे बादल से वर्षा होने पर सूखी भूमि सरस हो जाती है, वैसे ही सबके आत्मा में स्थित परमात्मा के पास से आनन्दरस की वर्षा होने पर आत्मा, मन, बुद्धि आदि सब सरस और सप्राण हो जाते हैं ॥२॥
Subject
अब परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं।