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Samveda Mantra 892

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- मेध्यातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प्र꣢꣫ यद्गावो꣣ न꣡ भूर्ण꣢꣯यस्त्वे꣣षा꣢ अ꣣या꣢सो꣣ अ꣡क्र꣢मुः । घ्न꣡न्तः꣢ कृ꣣ष्णा꣢꣫मप꣣ त्व꣡च꣢म् ॥८९२॥

प्र꣢ । यत् । गा꣡वः꣢꣯ । न । भू꣡र्ण꣢꣯यः । त्वे꣣षाः꣢ । अ꣣या꣡सः꣢ । अ꣡क्र꣢꣯मुः । घ्न꣡न्तः꣢꣯ । कृ꣣ष्णा꣢म् । अ꣡प꣢꣯ । त्व꣡च꣢꣯म् ॥८९२॥

Mantra without Swara
प्र यद्गावो न भूर्णयस्त्वेषा अयासो अक्रमुः । घ्नन्तः कृष्णामप त्वचम् ॥

प्र । यत् । गावः । न । भूर्णयः । त्वेषाः । अयासः । अक्रमुः । घ्नन्तः । कृष्णाम् । अप । त्वचम् ॥८९२॥

Samveda - Mantra Number : 892
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 1;

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Meaning
(यत्) जब (गावः न) गायों से समान (भूर्णयः) भरण-पोषण करनेवाले, (त्वेषाः) उज्ज्वल, (अयासः) शिष्यों के प्रति जानेवाले ज्ञानरस (प्र अक्रमुः) प्रदान किये जाने आरम्भ होते हैं, तब वे (त्वचम्) ढकनेवाली (कृष्णाम्) अविद्या-रात्रि को (घ्नन्तः) नष्ट कर देते हैं ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
Essence
जब शिष्य विविध लौकिक विद्याओं और ब्रह्मविद्याओं को प्राप्त कर लेते हैं, तब सारी अविद्यारूप निशाएँ दूर हो जाती हैं ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में ४९१ क्रमाङ्क पर परमात्मा से उत्पन्न होनेवाले आनन्दरस के विषय में व्याख्यात हुई थी। यहाँ आचार्य से उत्पन्न होनेवाले ज्ञान का विषय वर्णित है।