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Samveda Mantra 889

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अहमीयुराङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प꣡व꣢मानो अजीजनद्दि꣣व꣢श्चि꣣त्रं꣡ न त꣢꣯न्य꣣तु꣢म् । ज्यो꣡ति꣢र्वैश्वान꣣रं꣢ बृ꣣ह꣢त् ॥८८९॥

प꣡व꣢꣯मानः । अ꣢जीजनत् । दिवः꣢ । चि꣣त्र꣢म् । न । त꣣न्य꣢तुम् । ज्यो꣡तिः꣢꣯ । वै꣣श्वानर꣢म् । वै꣣श्व । नर꣢म् । बृ꣡ह꣢त् ॥८८९॥

Mantra without Swara
पवमानो अजीजनद्दिवश्चित्रं न तन्यतुम् । ज्योतिर्वैश्वानरं बृहत् ॥

पवमानः । अजीजनत् । दिवः । चित्रम् । न । तन्यतुम् । ज्योतिः । वैश्वानरम् । वैश्व । नरम् । बृहत् ॥८८९॥

Samveda - Mantra Number : 889
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 1;

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Meaning
(पवमानः) चरित्र को पवित्र करनेवाले परमात्मा वा आचार्य ने (दिवः) आकाशः की (चित्रम्) अद्भुत (तन्यतुं न) बिजली के समान (वैश्वानरम्) सबका नेतृत्व करनेवाली (बृहत्) महान् (ज्योतिः) विज्ञान-ज्योति को अथवा ज्योतिष्मती प्रज्ञा को (अजीजनत्) उत्पन्न कर दिया है ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
Essence
परमात्मा और योगप्रशिक्षक आचार्य की कृपा से मनुष्यों के अन्तःकरणों में तमोवृत्ति का विनाश और दिव्य ज्योति, विज्ञान-प्रकाश तथा ज्योतिष्मती प्रज्ञा का उदय होता है ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा की पूर्वार्चिक में ४८४ क्रमाङ्क पर परमात्मा के विषय में व्याख्या हो चुकी है। यहाँ परमात्मा और आचार्य दोनों का विषय वर्णित है।