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Samveda Mantra 880

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- गोषूक्त्यश्वसूक्तिनौ काण्वायनौ Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
तं꣢ ते꣣ म꣡दं꣢ गृणीमसि꣣ वृ꣡ष꣢णं पृ꣣क्षु꣡ सा꣢स꣣हि꣢म् । उ꣣ लोककृत्नु꣡म꣢द्रिवो हरि꣣श्रि꣡य꣢म् ॥८८०॥

त꣢म् । ते꣡ । म꣡द꣢꣯म् । गृ꣣णीमसि । वृ꣡ष꣢꣯णम् । पृ꣣क्षु꣢ । सा꣣सहि꣢म् । उ꣢ । लोककुत्नु꣢म् । लो꣣क । कृत्नु꣢म् । अ꣣द्रिवः । अ । द्रिवः । हरिश्रि꣡य꣢म् । ह꣣रि । श्रि꣡य꣢꣯म् ॥८८०॥

Mantra without Swara
तं ते मदं गृणीमसि वृषणं पृक्षु सासहिम् । उ लोककृत्नुमद्रिवो हरिश्रियम् ॥

तम् । ते । मदम् । गृणीमसि । वृषणम् । पृक्षु । सासहिम् । उ । लोककुत्नुम् । लोक । कृत्नुम् । अद्रिवः । अ । द्रिवः । हरिश्रियम् । हरि । श्रियम् ॥८८०॥

Samveda - Mantra Number : 880
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 6;

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अद्रिवः) किसी से विदारण न किये जा सकनेवाले तथा स्वयं दोषों और शुत्रओं का विदारण करनेवाले परमात्मन्, आचार्य वा राजन् ! (ते) आपके (तम्) उस प्रसिद्ध (मदम्) आनन्दप्रद ज्ञान वा बल की हम (गृणीमसि) स्तुति करते हैं, जो ज्ञान वा बल (वृषणम्) सुख आदि की वर्षा करनेवाला, (पृक्षु) देवासुरसंग्रामों में (सासहिम्) अतिशय रूप से असुरों का पराभव करनेवाला, (उ) और (हरिश्रियम्) मनोहर शोभावाला है ॥१॥
Essence
परमात्मा के समान आचार्य और राजा का भी ज्ञान वा बल अत्यधिक विशाल, प्रजाओं और शिष्यों को सुख देनेवाला, विपत्तियों का विदारण करनेवाला, कीर्ति देनेवाला और उज्ज्वल होवे ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा की पूर्वार्चिक में क्रमाङ्क ३८३ पर परमेश्वर के गुण-कर्मों के विषय में व्याख्या की जा चुकी है। यहाँ परमेश्वर, आचार्य और राजा का विषय वर्णित है।