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Samveda Mantra 878

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- सौभरि: काण्व: Chhand- प्रगाथः(विषमा बृहती, समा सतोबृहती) Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
प्र꣡ मꣳहि꣢꣯ष्ठाय गायत ऋ꣣ता꣡व्ने꣢ बृह꣣ते꣢ शु꣣क्र꣡शो꣢चिषे । उ꣣पस्तुता꣡सो꣢ अ꣣ग्न꣡ये꣢ ॥८७८॥

प्र꣢ । म꣡ꣳहि꣢꣯ष्ठाय । गा꣣यत । ऋता꣡व्ने꣢ । बृ꣣हते꣢ । शु꣣क्र꣡शो꣢चिषे । शु꣣क्र꣢ । शो꣣चिषे । उपस्तुता꣡सः꣢ । उ꣡प । स्तुता꣡सः꣢ । अ꣣ग्न꣡ये꣢ ॥८७८॥

Mantra without Swara
प्र मꣳहिष्ठाय गायत ऋताव्ने बृहते शुक्रशोचिषे । उपस्तुतासो अग्नये ॥

प्र । मꣳहिष्ठाय । गायत । ऋताव्ने । बृहते । शुक्रशोचिषे । शुक्र । शोचिषे । उपस्तुतासः । उप । स्तुतासः । अग्नये ॥८७८॥

Samveda - Mantra Number : 878
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 6;

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1 Bhashyas
Meaning
हे (उपस्तुतासः) प्रशंसित लोगो ! तुम (मंहिष्ठाय) अतिशय दानी, (ऋताव्ने) सत्यपरायण, (बृहते) महान्, (शुक्रशोचिषे) दीप्त तेजवाले (अग्नये) अग्रनायक आचार्य, राजा वा यज्ञाग्नि के लिए (प्र गायत) प्रकृष्ट रूप से महिमागान करो ॥१॥
Essence
मनुष्यों को चाहिए कि धन, विद्या आदि के दाता, सत्यनिष्ठ, तेजस्वी महान् जन को ही आचार्यरूप में और राजारूप में चुनें और उन्हें उचित है कि वे बहुत लाभ देनेवाले, सत्य गुण-कर्म-स्वभाववाले, प्रदीप्त ज्वालावाले यज्ञाग्नि में मन्त्रोच्चारणपूर्वक होम किया करें ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में १०७ क्रमाङ्क पर परमेश्वर के विषय में व्याख्यात हो चुकी है। यहाँ आचार्य, राजा और यज्ञाग्नि का विषय वर्णित है।