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Samveda Mantra 877

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- पवित्र आङ्गिरसः Chhand- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
अ꣡रू꣢रुचदु꣣ष꣢सः꣣ पृ꣡श्नि꣢र꣣ग्रि꣢य उ꣣क्षा꣡ मि꣢मेति꣣ भु꣡व꣢नेषु वाज꣣युः꣢ । मा꣣यावि꣡नो꣢ ममिरे अस्य मा꣣य꣡या꣢ नृ꣣च꣡क्ष꣢सः पि꣣त꣢रो꣣ ग꣢र्भ꣣मा꣡ द꣢धुः ॥८७७॥

अ꣡रु꣢꣯रुचत् । उ꣣ष꣡सः꣢ । पृ꣡श्निः꣢꣯ । अ꣣ग्रियः꣢ । उ꣣क्षा꣢ । मि꣣मेति । भु꣡व꣢꣯नेषु । वा꣣ज꣢युः । मा꣣यावि꣡नः꣢ । म꣣मिरे । अस्य । माय꣡या꣢ । नृ꣣च꣡क्ष꣢सः । नृ꣣ । च꣡क्ष꣢꣯सः । पि꣣त꣡रः꣢ । ग꣡र्भ꣢꣯म् । आ । द꣣धुः ॥८७७॥

Mantra without Swara
अरूरुचदुषसः पृश्निरग्रिय उक्षा मिमेति भुवनेषु वाजयुः । मायाविनो ममिरे अस्य मायया नृचक्षसः पितरो गर्भमा दधुः ॥

अरुरुचत् । उषसः । पृश्निः । अग्रियः । उक्षा । मिमेति । भुवनेषु । वाजयुः । मायाविनः । ममिरे । अस्य । मायया । नृचक्षसः । नृ । चक्षसः । पितरः । गर्भम् । आ । दधुः ॥८७७॥

Samveda - Mantra Number : 877
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 5;

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1 Bhashyas
Meaning
यह (अग्रियः) आगे जानेवाला (पृश्निः) सूर्यरूप पवमान सोम (उषसः) उषाओं को (अरूरुचत्) चमकाता है। यह (उक्षा) वर्षाजल से सींचनेवाला सूर्य (भुवनेषु) भूमण्डलों में (वाजयुः) दूसरों को अन्न देना चाहता हुआ (मिमेति) बादल के जल को नीचे फेंकता है। (अस्य) इस सूर्य के ही (मायया) कर्म से (मायाविनः) कर्मयुक्त होते हुए वायु, जल, बिजली आदि (ममिरे) पदार्थों का निर्माण करते हैं और इस सूर्य के ही कर्म से (नृचक्षसः) मनुष्यों को प्रकाश देनेवाली (पितरः) पालक किरणें (गर्भम् आदधुः) ओषधी आदियों में गर्भ स्थापित करती हैं ॥३॥
Essence
सौरमण्डल में उषा का प्रादुर्भाव, जल की वर्षा, बिजली चमकना, वायु का चलना, बीजों का अङ्कुरित होना आदि जो कुछ भी कर्म है, वह सब सूर्य के द्वारा ही किया जाता है। इस रूप में उसका महत्त्व जानकर उसका उपयोग शिल्प आदि में करना चाहिए। सूर्य में भी सब शक्ति परमात्मा की ही दी हुई है, इस कारण सूर्य का भी सूर्य परमात्मा है, यह भी जानना चाहिए ॥३॥ चतुर्थ अध्याय में पञ्चम खण्ड समाप्त ॥
Subject
तृतीय ऋचा की पूर्वार्चिक में ५१६ क्रमाङ्क पर परमात्मारूप सोम के विषय में व्याख्या हो चुकी है। यहाँ सोम का वर्णन सूर्यरूप में दर्शाते हैं।