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Samveda Mantra 870

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- त्रित आप्त्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣣भि꣡ ब्रह्मी꣢꣯रनूषत य꣣ह्वी꣢रृ꣣त꣡स्य꣢ मा꣣त꣡रः꣢ । म꣣र्ज꣡य꣢न्ती꣣र्दिवः꣡ शिशु꣢꣯म् ॥८७०॥

अ꣣भि꣢ । ब्र꣡ह्मीः꣢꣯ । अ꣣नूषत । यह्वीः꣢ । ऋ꣣त꣡स्य꣢ । मा꣣त꣡रः꣢ । म꣣र्ज꣡य꣢न्तीः । दि꣣वः꣢ । शि꣡शु꣢꣯म् ॥८७०॥

Mantra without Swara
अभि ब्रह्मीरनूषत यह्वीरृतस्य मातरः । मर्जयन्तीर्दिवः शिशुम् ॥

अभि । ब्रह्मीः । अनूषत । यह्वीः । ऋतस्य । मातरः । मर्जयन्तीः । दिवः । शिशुम् ॥८७०॥

Samveda - Mantra Number : 870
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 5;

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1 Bhashyas
Meaning
प्रथम—वेदवाणी के पक्ष में। (यह्वीः) महत्त्वशालिनी, (ऋतस्य मातरः) सत्यज्ञान का निर्माण करनेवाली, (दिवः शिशुम्) तेजस्वी परमात्मा के पुत्र मानव को (मर्जयन्तीः) शुद्ध-पवित्र करती हुई (ब्रह्मीः) ब्रह्मा से प्रोक्त वेदवाणियाँ (अभि अनूषत) गुण-वर्णन द्वारा सब पदार्थों की स्तुति करती हैं ॥ द्वितीय—चन्द्र के पक्ष में। (यह्वीः) महान् (ऋतस्य मातरः) वृष्टि-जल का निर्माण करनेवाली, (मर्जयन्तीः) अपने प्रकाश द्वारा सबका शोधन करनेवाली या सबको अलङ्कृत करनेवाली (ब्रह्मीः) महान् सूर्य की कान्तियाँ (दिवः शिशुम्) आकाश के शिशु के समान विद्यमान चन्द्रमा को (अभि) लक्ष्य करके अर्थात् उसे प्रकाशित करने के लिए (अनूषत) जाती हैं ॥२॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। द्वितीय व्याख्या में चन्द्रमा को ‘आकाश का शिशु’ कहने में लुप्तोपमा है ॥२॥
Essence
जैसे माताएँ शिशु को प्राप्त होती हैं, वैसे ही वेदवाणियाँ गुणवर्णन द्वारा सब पदार्थों को प्राप्त होती हैं और सूर्यकिरणें चन्द्रमा को प्रकाशित करने के लिए उसे प्राप्त होती हैं ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में वेदवाणी का और चन्द्रमा का विषय वर्णित है।