Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Samveda Mantra 867

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- प्रगाथः(विषमा बृहती, समा सतोबृहती) Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
त꣣र꣢णि꣣रि꣡त्सि꣢षासति꣣ वा꣢जं꣣ पु꣡र꣢न्ध्या यु꣣जा꣢ । आ꣢ व꣣ इ꣡न्द्रं꣢ पुरुहू꣣तं꣡ न꣢मे गि꣣रा꣢ ने꣣मिं꣡ तष्टे꣢꣯व सु꣣द्रु꣡व꣢म् ॥८६७॥

त꣣र꣡णिः꣢ । इत् । सि꣣षासति । वा꣡ज꣢꣯म् । पु꣡र꣢꣯न्ध्या । पु꣡र꣢꣯म् । ध्या꣣ । युजा꣢ । आ । वः꣣ । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । पु꣣रुहू꣢तम् । पु꣣रु । हू꣢तम् । न꣣मे । गिरा꣢ । ने꣣मि꣢म् । त꣡ष्टा꣢꣯ । इ꣣व । सुद्रु꣡व꣢꣯म् । सु꣣ । द्रु꣡व꣢꣯म् ॥८६७॥

Mantra without Swara
तरणिरित्सिषासति वाजं पुरन्ध्या युजा । आ व इन्द्रं पुरुहूतं नमे गिरा नेमिं तष्टेव सुद्रुवम् ॥

तरणिः । इत् । सिषासति । वाजम् । पुरन्ध्या । पुरम् । ध्या । युजा । आ । वः । इन्द्रम् । पुरुहूतम् । पुरु । हूतम् । नमे । गिरा । नेमिम् । तष्टा । इव । सुद्रुवम् । सु । द्रुवम् ॥८६७॥

Samveda - Mantra Number : 867
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 4;

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
(तरणिः इत्) आपत्ति में पड़े हुओं को दुःखों से तराने की इच्छावाला मनुष्य ही (युजा) सहायकभूत, (पुरन्ध्या) बहुतों का धारण करनेवाली सहानुभूतिपूर्ण बुद्धि से (वाजम्) धन (सिषासति) दूसरों को देना चाहता है। इसलिए मैं (पुरुहूतम्) बहुतों से पुकारे जानेवाले (वः) तुम्हारे (इन्द्रम्) धनिक वर्ग को (गिरा) वाणी से, उपदेश के द्वारा (आनमे) झुकाता हूँ, अर्थात् गरीबों को धन देने के लिए प्रवृत्त करता हूँ, (तष्टा इव) जैसे शिल्पी (नेमिम्) रथ के पहिए की परिधि को (सुद्रुवम्) सुचारू रूप से घूमने योग्य बनाता है ॥१॥ यहाँ उपामलङ्कार है ॥१॥
Essence
मनुष्यों को चाहिए कि ईश्वरोपासना के साथ धनादि के दान द्वारा दीनों की सहायता भी करें ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में २३८ क्रमाङ्क पर परमेश्वर और राजा के विषय में व्याख्यात की जा चुकी है। यहाँ धनदाता की प्रशंसा है।