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Samveda Mantra 859

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- पराशरः शाक्त्यः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ति꣣स्रो꣡ वाच꣢꣯ ईरयति꣣ प्र꣡ वह्नि꣢꣯रृ꣣त꣡स्य꣢ धी꣣तिं꣡ ब्रह्म꣢꣯णो मनी꣣षा꣢म् । गा꣡वो꣢ यन्ति꣣ गो꣡प꣢तिं पृ꣣च्छ꣡मा꣢नाः꣣ सो꣡मं꣢ यन्ति म꣣त꣡यो꣢ वावशा꣣नाः꣢ ॥८५९॥

ति꣣स्रः꣢ । वा꣡चः꣢꣯ । ई꣣रयति । प्र꣢ । व꣡ह्निः꣢꣯ । ऋ꣣त꣡स्य꣢ । धी꣣ति꣢म् । ब्र꣡ह्म꣢꣯णः । म꣣नीषा꣢म् । गा꣡वः꣢꣯ । य꣣न्ति । गो꣡प꣢꣯तिम् । गो । प꣣तिम् । पृच्छ꣡मा꣢नाः । सो꣡म꣢꣯म् । य꣣न्ति । म꣡त꣢यः । वा꣣वशानाः꣢ ॥८५९॥

Mantra without Swara
तिस्रो वाच ईरयति प्र वह्निरृतस्य धीतिं ब्रह्मणो मनीषाम् । गावो यन्ति गोपतिं पृच्छमानाः सोमं यन्ति मतयो वावशानाः ॥

तिस्रः । वाचः । ईरयति । प्र । वह्निः । ऋतस्य । धीतिम् । ब्रह्मणः । मनीषाम् । गावः । यन्ति । गोपतिम् । गो । पतिम् । पृच्छमानाः । सोमम् । यन्ति । मतयः । वावशानाः ॥८५९॥

Samveda - Mantra Number : 859
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 3;

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1 Bhashyas
Meaning
(वह्निः) काव्य का वाहक महाकवि (तिस्रः) गद्य, पद्य एवं उभयात्मक अथवा अभिधात्मक, लक्षणात्मक एवं व्यञ्जनात्मक, (वाचः) वाणियों को (प्र ईरयति) प्रयुक्त करता है। वह अपने काव्य में (ऋतस्य) सत्य के (धीतिम्) धारण को और (ब्रह्मणः) परमात्मा की (मनीषाम्) स्तुति को भी प्रयुक्त करता है। (गावः) वाणियाँ (गोपतिम्) उस वागीश्वर महाकवि के विषय में (पृच्छमानाः) पूछती हुई (यन्ति) जा रही हैं—कहाँ है वह महाकवि जो अपने काव्य में प्रयुक्त करके हमें कृतार्थ करेगा, मानो यह पूछती हैं। (मतयः) स्तुतियाँ भी, मानो (सोमम्) उसी रससिद्ध कवि को (वावशानाः) चाहती हुई, खोजती हुई (यन्ति) जा रही हैं ॥१॥ यहाँ उत्तरार्ध में असम्बन्ध में सम्बन्ध रूप अतिशयोक्ति अलङ्कार है ॥१॥
Essence
कोई विरले ही रससिद्ध कवि अभिधा, लक्षणा, व्यञ्जनावाली गद्य, पद्य, उभय रूप वाणी को प्रयुक्त करते हुए सात्त्विक, शान्तरसमय ब्रह्मस्तोत्रों को रचकर अपनी वाणी को कृतकृत्य करते हैं ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में ५२५ क्रमाङ्क पर परमात्मा, जीवात्मा और आचार्य के विषय में व्याख्यात हो चुकी है। यहाँ महाकवि के कर्म का वर्णन किया जाता है।