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Samveda Mantra 850

1875 Mantra
Devata- मरुत इन्द्रश्च Rishi- मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इ꣡न्द्रे꣢ण꣣ स꣡ꣳ हि दृक्ष꣢꣯से संजग्मा꣣नो꣡ अबि꣢꣯भ्युषा । म꣣न्दू꣡ स꣢मा꣣न꣡व꣢र्च्चसा ॥८५०॥

इ꣡न्द्रे꣢꣯ण । सम् । हि । दृ꣡क्ष꣢꣯से । सं꣣जग्मानः꣢ । स꣣म् । जग्मानः꣢ । अ꣡बि꣢꣯भ्युषा । अ । बि꣣भ्युषा । मन्दू꣡ इति꣢ । स꣣मान꣡व꣢र्चसा । स꣣मान꣢ । व꣣र्चसा ॥८५०॥

Mantra without Swara
इन्द्रेण सꣳ हि दृक्षसे संजग्मानो अबिभ्युषा । मन्दू समानवर्च्चसा ॥

इन्द्रेण । सम् । हि । दृक्षसे । संजग्मानः । सम् । जग्मानः । अबिभ्युषा । अ । बिभ्युषा । मन्दू इति । समानवर्चसा । समान । वर्चसा ॥८५०॥

Samveda - Mantra Number : 850
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 2;

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1 Bhashyas
Meaning
हे मरुतों के गण अर्थात् प्राण-गण ! तू (अबिभ्युषा) निर्भय (इन्द्रेण) जीवात्मा के साथ (संजग्मानः) सङ्गत होता हुआ (संदृक्षसे) दिखायी देता है। तुम दोनों अर्थात् प्राण-गण और जीवात्मा (मन्दू) आनन्द देनेवाले, तथा (समानवर्चसा) तुल्य तेजवाले हो ॥१॥
Essence
शरीर में जीवात्मा और प्राण दोनों का समान महत्त्व है। प्राण के बिना जीवात्मा और जीवात्मा के बिना प्राण कुछ नहीं कर सकता ॥१॥
Subject
प्रथम मन्त्र में जीवात्मा और प्राण का विषय है।