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Samveda Mantra 848

1875 Mantra
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ऋ꣣ते꣡न꣢ मित्रावरुणावृतावृधावृतस्पृशा । क्र꣡तुं꣢ बृ꣣ह꣡न्त꣢माशाथे ॥८४८॥

ऋ꣣ते꣡न꣢ । मि꣣त्रा । मि । त्रा । वरुणौ । ऋतावृधौ । ऋत । वृधौ । ऋतस्पृशा । ऋत । स्पृशा । क्र꣡तु꣢꣯म् । बृ꣣ह꣡न्त꣢म् । आ꣣शाथेइ꣡ति꣢ ॥८४८॥

Mantra without Swara
ऋतेन मित्रावरुणावृतावृधावृतस्पृशा । क्रतुं बृहन्तमाशाथे ॥

ऋतेन । मित्रा । मि । त्रा । वरुणौ । ऋतावृधौ । ऋत । वृधौ । ऋतस्पृशा । ऋत । स्पृशा । क्रतुम् । बृहन्तम् । आशाथेइति ॥८४८॥

Samveda - Mantra Number : 848
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 2;

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Meaning
हे (ऋतस्पृशा) सत्य ज्ञान और सत्य कर्म को प्राप्त करनेवाले, (ऋतावृधा) सत्य ज्ञान और सत्य कर्म को बढ़ानेवाले (मित्रावरुणौ) ब्राह्मण-क्षत्रियो ! तुम दोनों (ऋतेन) सत्य ज्ञान और सत्य कर्म से (बृहन्तम्) विशाल (क्रतुम्) राष्ट्रयज्ञ को (आशाथे) व्याप्त करते हो ॥२॥
Essence
ब्राह्मण और क्षत्रिय लोग सत्य ज्ञान और सत्य कर्म को स्वयं ग्रहण करके तथा अन्यों को उसकी शिक्षा देकर राष्ट्र की उन्नतिरूप यज्ञ को करते हैं ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में फिर ब्रह्म-क्षत्र का विषय वर्णित है।

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