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Samveda Mantra 845

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
य꣡स्त्वाम꣢꣯ग्ने ह꣣वि꣡ष्प꣢तिर्दू꣣तं꣡ दे꣢व सप꣣र्य꣡ति꣢ । त꣡स्य꣢ स्म प्रावि꣣ता꣡ भ꣢व ॥८४५॥

यः꣢ । त्वाम् । अ꣣ग्ने । हवि꣡ष्प꣢तिः । ह꣣विः꣢ । प꣣तिः । दूत꣢म् । दे꣣व । सपर्य꣡ति꣢ । त꣡स्य꣢꣯ । स्म꣣ । प्राविता꣢ । प्र꣣ । आविता꣣ । भव ॥८४५॥

Mantra without Swara
यस्त्वामग्ने हविष्पतिर्दूतं देव सपर्यति । तस्य स्म प्राविता भव ॥

यः । त्वाम् । अग्ने । हविष्पतिः । हविः । पतिः । दूतम् । देव । सपर्यति । तस्य । स्म । प्राविता । प्र । आविता । भव ॥८४५॥

Samveda - Mantra Number : 845
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 2;

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1 Bhashyas
Meaning
प्रथम—परमात्मा के पक्ष में। हे (देव) स्वतः प्रकाशमान, सबके प्रकाशक, दानादि गुणों से युक्त, सर्वान्तर्यामी (अग्ने) अग्रनायक जगदीश्वर ! (यः) जो (हविष्पतिः) हवियों का स्वामी अर्थात् अपनी हवि देकर तेरी उपासना करनेवाला मनुष्य (दूतम्) दुर्गुण, दुर्व्यसन, दुःख आदियों को दग्ध करनेवाले (त्वा) तुझ परमात्मा की (सपर्यति) उपासना करता है, (तस्य) उस उपासक का तू (प्राविता) प्रकृष्ट रक्षक (भव स्म) हो जा ॥ द्वितीय—यज्ञ के पक्ष में। हे (देव) प्रकाशमान, प्रकाशक गतिमय ज्वालाओंवाले यज्ञाग्नि ! (यः) जो (हविष्पतिः) होम के योग्य सुगन्धित, मधुर, पुष्टिप्रद तथा आरोग्यप्रद द्रव्यों का स्वामी याज्ञिक जन (दूतम्) रोग, आलस्य आदियों को दग्ध करनेवाले (त्वा) तेरी (सपर्यति) यज्ञानुष्ठान द्वारा सेवा करता है, (तस्य) उस याज्ञिक मनुष्य का तू (प्राविता) प्रकृष्ट रक्षक (भव स्म) हो जा ॥२॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥२॥
Essence
जैसे उपासना किया गया परमेश्वर उपासक के दुर्गुण आदि को दग्ध करके उसे सन्मार्ग पर चलाकर उसकी रक्षा करता है, वैसे ही आरोग्य आदि करनेवाले द्रव्यों से होम किया गया यज्ञाग्नि यजमान को आरोग्य आदि प्राप्त कराकर उसका बहुत उपकार करता है ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में पुनः परमात्मा और यज्ञ का विषय वर्णित करते हैं।