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Samveda Mantra 843

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- कश्यपो मारीचः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
पु꣣नानो꣢ दे꣣व꣡वी꣢तय꣣ इ꣡न्द्र꣢स्य याहि निष्कृ꣣त꣢म् । द्यु꣣तानो꣢ वा꣣जि꣡भि꣢र्हि꣣तः꣢ ॥८४३॥

पु꣣ना꣢नः । दे꣣व꣢वी꣢तये । दे꣣व꣢ । वी꣣तये । इ꣡न्द्र꣢꣯स्य । या꣣हि । निष्कृत꣢म् । निः꣣ । कृत꣢म् । द्यु꣣ता꣢नः । वा꣣जि꣡भिः꣢ । हि꣣तः꣢ ॥८४३॥

Mantra without Swara
पुनानो देववीतय इन्द्रस्य याहि निष्कृतम् । द्युतानो वाजिभिर्हितः ॥

पुनानः । देववीतये । देव । वीतये । इन्द्रस्य । याहि । निष्कृतम् । निः । कृतम् । द्युतानः । वाजिभिः । हितः ॥८४३॥

Samveda - Mantra Number : 843
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 1;

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्यार्थी ! तू (देववीतये) अहिंसा, सत्य, अस्तेय, न्याय, दया, उदारता आदि दिव्य गुणों की प्राप्ति के लिए (पुनानः) स्वयं को पवित्र करता हुआ (इन्द्रस्य) कुलपति आचार्य के (निष्कृतम्) घर अर्थात् गुरुकुल को (याहि) जा और वहाँ (हितः) प्रविष्ट किया गया तू (वाजिभिः) विज्ञानी गुरुओं के द्वारा (द्युतानः) विद्या के तेज से और सच्चरित्रता के तेज से चमकनेवाला बन ॥३॥
Essence
विद्यार्थी गुरुकुल में ब्रह्मचर्यपूर्वक विधि के अनुसार वेदादि शास्त्रों को पढ़कर, सदाचार की शिक्षा लेकर, योगाभ्यास से आध्यात्मिक उन्नति करके, विद्वान् होकर, समावर्तन के बाद बाहर जाकर पढ़ी हुई विद्या का सब जगह प्रचार करें ॥३॥ इस खण्ड में उपासक, योगी, परमात्मा, गुरु-शिष्य और प्रसङ्गतः राजा, चन्द्रमा आदि के विषय का प्रतिपादन होने से इस खण्ड की पूर्वखण्ड के साथ सङ्गति है ॥ चतुर्थ अध्याय में प्रथम खण्ड समाप्त ॥
Subject
अगले मन्त्र में विद्यार्थी को सम्बोधन किया गया है।