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Samveda Mantra 84

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
त्व꣡ꣳहि क्षैत꣢꣯व꣣द्य꣡शोऽग्ने꣢꣯ मि꣣त्रो꣡ न पत्य꣢꣯से । त्वं꣡ वि꣢चर्षणे꣣ श्र꣢वो꣣ व꣡सो꣢ पु꣣ष्टिं꣡ न पु꣢꣯ष्यसि ॥८४॥

त्व꣢म् । हि । क्षै꣡त꣢꣯वत् । य꣡शः꣢꣯ । अ꣡ग्ने꣢꣯ । मि꣣त्रः꣢ । मि꣣ । त्रः꣢ । न । प꣡त्य꣢꣯से । त्वम् । वि꣣चर्षणे । वि । चर्षणे । श्र꣡वः꣢꣯ । व꣡सो꣢꣯ । पु꣣ष्टि꣢म् । न । पु꣣ष्यसि ॥८४॥

Mantra without Swara
त्वꣳहि क्षैतवद्यशोऽग्ने मित्रो न पत्यसे । त्वं विचर्षणे श्रवो वसो पुष्टिं न पुष्यसि ॥

त्वम् । हि । क्षैतवत् । यशः । अग्ने । मित्रः । मि । त्रः । न । पत्यसे । त्वम् । विचर्षणे । वि । चर्षणे । श्रवः । वसो । पुष्टिम् । न । पुष्यसि ॥८४॥

Samveda - Mantra Number : 84
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 9;

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Meaning
हे (अग्ने) परमात्मन् ! (त्वम्) आप (हि) निश्चय ही (क्षैतवत्) राजा के समान, और (मित्रः न) सूर्य के समान (यशः) यश के (पत्यसे) स्वामी हो। हे (विचर्षणे) सर्वद्रष्टा, (वसो) निवासक सर्वव्यापी परब्रह्म ! (त्वम्) आप (पुष्टिं न) जैसे शारीरिक और आत्मिक पुष्टि को देते हो, वैसे ही हमें (श्रवः) कीर्ति को भी (पुष्यसि) देते हो ॥४॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। ‘क्षैतवत्, मित्रः न, पुष्टिं न’ ये तीन उपमाएँ हैं ॥४॥
Essence
जैसे राजा राष्ट्र का संचालक होने से और सूर्य पृथिवी आदि ग्रहोपग्रहों का संचालक होने से यश से प्रख्यात होता है, वैसे ही परमेश्वर जड़-चेतन ब्रह्माण्ड का संचालक होने से जगद्व्यापिनी परम कीर्ति को प्राप्त किये हुए है और वह प्रार्थी मनुष्यों को भी कीर्ति प्रदान करता है ॥४॥
Subject
अगले मन्त्र में परमात्मा के गुणों का वर्णन किया गया है।

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