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Samveda Mantra 838

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- कविर्भार्गवः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣡त꣢स्त्वा र꣣यि꣢र꣣꣬भ्य꣢꣯य꣣द्रा꣡जा꣢नꣳ सुक्रतो दि꣣वः꣢ । सु꣣पर्णो꣡ अ꣢व्य꣣थी꣡ भ꣢रत् ॥८३८॥

अ꣡तः꣢꣯ । त्वा꣣ । रयिः꣢ । अ꣣भि꣢ । अ꣢यत् । रा꣡जा꣢꣯नम् । सु꣣क्रतो । सु । क्रतो । दिवः꣢ । सु꣣प꣢र्णः । सु꣣ । पर्णः꣢ । अ꣣व्यथी꣢ । अ꣣ । व्यथी꣢ । भ꣣रत् ॥८३८॥

Mantra without Swara
अतस्त्वा रयिरभ्ययद्राजानꣳ सुक्रतो दिवः । सुपर्णो अव्यथी भरत् ॥

अतः । त्वा । रयिः । अभि । अयत् । राजानम् । सुक्रतो । सु । क्रतो । दिवः । सुपर्णः । सु । पर्णः । अव्यथी । अ । व्यथी । भरत् ॥८३८॥

Samveda - Mantra Number : 838
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 1;

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Meaning
प्रथम—परमात्मा के पक्ष में। हे (सुक्रतो) शुभ कर्म करनेवाले मनुष्य ! (राजानं त्वा) यश से जगमगानेवाले तुझे (दिवः) देदीप्यमान (अतः) इस पवमान सोम अर्थात् पवित्रकर्त्ता जगदुत्पादक परमेश्वर से ही (रयिः) ऐश्वर्य (अभ्ययत्) प्राप्त हुआ है, जिस ऐश्वर्य को (सुपर्णः) शुभ पालनकर्त्ता, (अव्यथी) किसी प्रकार की व्यथा से रहित उस परमेश्वर ने तेरे लिए (भरत्) दिया है ॥ द्वितीय—चन्द्रमा के पक्ष में। हे पवमान सोम अर्थात् गति करनेवाले चन्द्रमा ! (राजानं त्वा) दीप्तिमान् तुझे (अतः दिवः) इस सूर्यलोक से ही (रयिः) प्रकाशरूप धन (अभ्ययत्) मिलता है, जिसे (सुपर्णः) सुन्दर किरणोंवाला (अव्यथी) अविचल स्थिर सूर्य (भरत्) तेरे अन्दर लाता है ॥३॥ यहाँ श्लेषालङ्कार है ॥३॥
Essence
जैसे मनुष्य जगदीश्वर से सब प्रकार का धन प्राप्त करता है, वैसे ही चन्द्रमा सूर्य से दीप्ति पाता है ॥३॥
Subject
अगले मन्त्र में परमात्मा और चन्द्रमा का विषय वर्णित है।

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