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Samveda Mantra 837

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- कविर्भार्गवः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
सं꣡वृ꣢क्तधृष्णु꣣꣬मुक्थ्यं꣢꣯ म꣣हा꣡म꣢हिव्रतं꣣ म꣡द꣢म् । श꣣तं꣡ पुरो꣢꣯ रुरु꣣क्ष꣡णि꣢म् ॥८३७॥

सं꣡वृ꣢꣯क्तधृष्णुम् । सं꣡वृ꣢꣯क्त । धृ꣣ष्णुम् । उक्थ्य꣢म् । म꣣हा꣡म꣢हिव्रतम् । म꣣हा꣢ । म꣣हिव्रतम् । म꣡द꣢꣯म् । श꣣त꣢म् । पु꣡रः꣢꣯ । रु꣣रु꣡क्षि꣢णम् ॥८३७॥

Mantra without Swara
संवृक्तधृष्णुमुक्थ्यं महामहिव्रतं मदम् । शतं पुरो रुरुक्षणिम् ॥

संवृक्तधृष्णुम् । संवृक्त । धृष्णुम् । उक्थ्यम् । महामहिव्रतम् । महा । महिव्रतम् । मदम् । शतम् । पुरः । रुरुक्षिणम् ॥८३७॥

Samveda - Mantra Number : 837
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 1;

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1 Bhashyas
Meaning
(संवृक्तधृष्णुम्) काम, कोध्र आदि आन्तरिक अथवा बाह्य धर्षणशील शत्रुओं को नष्ट करनेवाले, (उक्थ्यम्) प्रशंसायोग्य, (महामहिव्रतम्) अतिशय पूजनीय कर्मोंवाले, (मदम्) आनन्दजनक, (शतं पुरः) सौ शत्रु-नगरियों को (रुरुक्षणिम्) तोड़-फोड़ देने के लिए कृतसंकल्प पवमान सोम को अर्थात् पवित्रकर्ता जगदीश्वर वा राजा को, हम (ईमहे) प्राप्त करते हैं। [यहाँ ‘ईमहे’ पद पूर्व मन्त्र से लाया गया है ] ॥२॥
Essence
जैसे जगदीश्वर आन्तरिक रिपुओं को नष्ट करता, प्रशंसनीय कर्म करता और अपने उपासकों को आनन्दित करता है, वैसे ही राजा सब विघ्नकारी शत्रुओं को उच्छिन्न करके राज्य की उन्नतिवाले कर्म करके प्रजाओं को आनन्दित करे ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में राजा और परमात्मा को विशेषित किया गया है।