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Samveda Mantra 831

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- जमदग्निर्भार्गवः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
वि꣣घ्न꣡न्तो꣢ दुरि꣣ता꣢ पु꣣रु꣢ सु꣣गा꣢ तो꣣का꣡य꣢ वा꣣जि꣡नः꣢ । त्म꣡ना꣢ कृ꣣ण्व꣢न्तो꣣ अ꣡र्व꣢तः ॥८३१॥

वि꣡घ्न꣢न्तः । वि꣣ । घ्न꣡न्तः꣢꣯ । दु꣣रिता꣢ । दुः꣣ । इता꣢ । पु꣣रु꣢ । सु꣣गा꣢ । सु꣣ । गा꣢ । तो꣣का꣡य꣢ । वा꣣जि꣡नः꣢ । त्म꣡ना꣢꣯ । कृ꣣ण्व꣡न्तः꣢ । अ꣡र्व꣢꣯तः ॥८३१॥

Mantra without Swara
विघ्नन्तो दुरिता पुरु सुगा तोकाय वाजिनः । त्मना कृण्वन्तो अर्वतः ॥

विघ्नन्तः । वि । घ्नन्तः । दुरिता । दुः । इता । पुरु । सुगा । सु । गा । तोकाय । वाजिनः । त्मना । कृण्वन्तः । अर्वतः ॥८३१॥

Samveda - Mantra Number : 831
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 1;

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Meaning
(वाजिनः) आत्मबल से युक्त ये सोम अर्थात् सौम्यगुणी उपासक (पुरु) बहुत से (दुरिता) दुर्गुण, दुर्व्यसन और दुःखों को (विघ्नन्तः) विनष्ट करते हुए, (तोकाय) सन्तान के लिए (सुगा) आसानी से प्राप्त होने योग्य भद्रों को रचते हुए और (त्मना) स्वयं को (अर्वतः) घोड़ों के समान प्रगतिशील (कृण्वन्तः) करते हुए (सुष्टुतिम्) उत्तम प्रशस्ति को (अभ्यर्षन्ति) प्राप्त करते हैं। [अभ्यर्षन्ति सुष्टुतिम्—यह वाक्य अगले मन्त्र से यहाँ लाया गया है] ॥२॥
Essence
हृदय से की गयी उपासना का यह अनिवार्य फल होता है कि उपासक के दुरित नष्ट हों, भद्र की प्राप्ति हो और वह आगे बढ़े ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में फिर वही विषय है।