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Samveda Mantra 830

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- जमदग्निर्भार्गवः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ए꣣त꣡ अ꣢सृग्र꣣मि꣡न्द꣢वस्ति꣣रः꣢ प꣣वि꣡त्र꣢मा꣣श꣡वः꣢ । वि꣡श्वा꣢न्य꣣भि꣡ सौभ꣢꣯गा ॥८३०॥

ए꣣ते꣢ । अ꣣सृग्रम् । इ꣡न्द꣢꣯वः । ति꣣रः꣢ । प꣣वि꣡त्र꣢म् । आ꣣श꣡वः꣢ । वि꣡श्वा꣢꣯नि । अ꣣भि꣢ । सौ꣡भ꣢꣯गा । सौ । भ꣣गा ॥८३०॥

Mantra without Swara
एत असृग्रमिन्दवस्तिरः पवित्रमाशवः । विश्वान्यभि सौभगा ॥

एते । असृग्रम् । इन्दवः । तिरः । पवित्रम् । आशवः । विश्वानि । अभि । सौभगा । सौ । भगा ॥८३०॥

Samveda - Mantra Number : 830
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 1;

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1 Bhashyas
Meaning
(एते) ये (तिरः) तिरछी गति से (आशवः) शीघ्र आगे बढ़नेवाले (इन्दवः) तेजस्वी उपासक लोग (पवित्रम्) पवित्र व्यवहार को (असृग्रम्) उत्पन्न करते हैं। इसीलिए (विश्वानि) सब (सौभगा) सौभाग्यों को (अभि) प्राप्त कर लेते हैं।
Essence
जगदीश्वर की उपासना से अपने हृदय को पवित्र करके समाज में सबके प्रति पवित्र व्यवहार यदि किया जाए तो निश्चय ही सब सौभाग्य प्राप्त हो जाते हैं ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा में उपासक का व्यवहार वर्णित है।