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Samveda Mantra 828

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- जेता माधुच्छन्दसः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
स꣣ख्ये꣡ त꣢ इन्द्र वा꣣जि꣢नो꣣ मा꣡ भे꣢म शवसस्पते । त्वा꣢म꣣भि꣡ प्र नो꣢꣯नुमो꣣ जे꣡ता꣢र꣣म꣡परा꣢जितम् ॥८२८॥

स꣣ख्ये꣢ । स꣣ । ख्ये꣢ । ते꣣ । इन्द्र । वाजि꣡नः꣢ । मा । भे꣣म । शवसः । पते । त्वा꣢म् । अ꣣भि꣢ । प्र । नो꣣नुमः । जे꣡ता꣢꣯रम् । अ꣡प꣢꣯राजितम् । अ । प꣣राजितम् ॥८२८॥

Mantra without Swara
सख्ये त इन्द्र वाजिनो मा भेम शवसस्पते । त्वामभि प्र नोनुमो जेतारमपराजितम् ॥

सख्ये । स । ख्ये । ते । इन्द्र । वाजिनः । मा । भेम । शवसः । पते । त्वाम् । अभि । प्र । नोनुमः । जेतारम् । अपराजितम् । अ । पराजितम् ॥८२८॥

Samveda - Mantra Number : 828
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 6;

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Meaning
हे (शवसः पते) बल के अधीश्वर (इन्द्र) परमैश्वर्यवान्, अविद्याविदारक जगदीश्वर वा आचार्य ! (वाजिनः) बलवान् हम (ते) आपकी (सख्ये) मित्रता में रहते हुए (मा भेम) भयभीत न हों। (जेतारम्) सब विघ्नों पर विजय पानेवाले, (अपराजितम्) किसी भी बाधा से पराजित न होनेवाले (त्वाम्) तुझ जगदीश्वर वा आचार्य को (अभि) लक्ष्य करके, हम (प्र नोनुमः) अतिशय बार-बार स्तुति करते हैं ॥२॥
Essence
ब्रह्मबल, आत्मबल, विद्याबल आदियों में बलिष्ठ, सब विपत्तियों पर विजय पानेवाले, किसी से भी पराजित न होनेवाले जगदीश्वर और आचार्य यदि हमारे साथी हो जाते हैं तो निर्भय रहते हुए हम सम्पूर्ण उत्कर्ष को पा सकते हैं ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में जगदीश्वर वा आचार्य से प्रार्थना की गयी है।

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