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Samveda Mantra 824

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- श्रुतकक्षः सुकक्षो वा आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ए꣣वा꣡ ह्यसि꣢꣯ वीर꣣यु꣢रे꣣वा꣡ शूर꣢꣯ उ꣣त꣢ स्थि꣣रः꣢ । ए꣣वा꣢ ते꣣ रा꣢ध्यं꣣ म꣡नः꣢ ॥८२४॥

ए꣣व꣢ । हि । अ꣡सि꣢꣯ । वी꣣रयुः꣢ । ए꣣व꣢ । शू꣡रः꣢꣯ । उ꣣त꣢ । स्थि꣣रः꣢ । ए꣣व꣢ । ते꣣ । रा꣡ध्य꣢꣯म् । म꣡नः꣢꣯ ॥८२४॥

Mantra without Swara
एवा ह्यसि वीरयुरेवा शूर उत स्थिरः । एवा ते राध्यं मनः ॥

एव । हि । असि । वीरयुः । एव । शूरः । उत । स्थिरः । एव । ते । राध्यम् । मनः ॥८२४॥

Samveda - Mantra Number : 824
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 6;

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1 Bhashyas
Meaning
हे मेरे अन्तरात्मा ! तू (एव हि) सचमुच (वीरयुः) वीरों का प्रेमी (असि) है, (एव) सचमुच, तू (शूरः) शूर (उत) और (स्थिरः) विपत्तियों तथा युद्धों में अविचल रहनेवाला है। (एव) सचमुच (ते) तेरा (मनः) मन (राध्यम्) सिद्धि प्राप्त करने योग्य है ॥१॥
Essence
मनुष्य का आत्मा यदि अपनी शक्ति को पहचान ले तो संसार में महान् कार्यों को कर सकता है ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में २३२ क्रमाङ्क पर परमात्मा और राजा के विषय में व्याख्यात हो चुकी है। यहाँ अपने अन्तरात्मा को उद्बोधन है।