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Samveda Mantra 819

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- नहुषो मानवः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
स꣡मु꣢ प्रि꣣या꣡ अ꣢नूषत꣣ गा꣢वो꣣ म꣡दा꣢य꣣ घृ꣡ष्व꣢यः । सो꣡मा꣢सः कृण्वते प꣣थः꣡ पव꣢꣯मानास꣣ इ꣡न्द꣢वः ॥८१९॥

सम् । उ꣣ । प्रियाः꣢ । अ꣣नूषत । गा꣡वः꣢꣯ । म꣡दा꣢꣯य । घृ꣡ष्व꣢꣯यः । सो꣡मा꣢꣯सः । कृ꣣ण्वते । पथः꣢ । प꣡व꣢꣯मानासः । इ꣡न्द꣢꣯वः ॥८१९॥

Mantra without Swara
समु प्रिया अनूषत गावो मदाय घृष्वयः । सोमासः कृण्वते पथः पवमानास इन्दवः ॥

सम् । उ । प्रियाः । अनूषत । गावः । मदाय । घृष्वयः । सोमासः । कृण्वते । पथः । पवमानासः । इन्दवः ॥८१९॥

Samveda - Mantra Number : 819
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 5;

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Meaning
प्रथम—ब्रह्मानन्द-रस के पक्ष में। (प्रियाः) परमेश्वर के प्रिय, (घृष्वयः) मानसिक संघर्ष में संलग्न (गावः) स्तोताजन (मदाय) आनन्द-प्राप्ति के लिए (सम् उ अनूषत) भली-भाँति परमेश्वर की स्तुति करते हैं। उसकी स्तुति से प्राप्त (इन्दवः) दीप्त या सराबोर करनेवाले (सोमासः) ब्रह्मानन्द-रस (पवमानासः) स्तोताओं को पवित्र करते हुए, उनके सम्मुख (पथः) कर्तव्य-मार्गों को (कृण्वते) स्पष्ट कर देते हैं ॥ द्वितीय—गुरुओं के पक्ष में। (प्रियाः) प्रिय, मधुर, (घृष्वयः) घर्षण अर्थात् पुनः-पुनः अभ्यास से उज्ज्वल (गावः) शिष्यों की वाणियाँ (मदाय) आनन्द-प्राप्ति के लिए (सम् उ अनूषत) गुरुओं की सम्यक् स्तुति करती हैं। वे (इन्दवः) ज्ञान से दीप्त (सोमासः) ज्ञानप्रेरक गुरुजन (पवमानासः) शिष्यों को पवित्र करते हुए, उनके सम्मुख (पथः) गन्तव्य मार्गों को (कृण्वते) स्पष्ट कर देते हैं ॥२॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥२॥
Essence
मनुष्यों को चाहिए कि परमात्मा की और गुरुजनों की भली-भाँति स्तुति करके आनन्द-रस तथा ज्ञान-रस को दुहकर उसके पान से स्वयं को पवित्र करके सन्मार्ग का अनुसरण करें ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में ब्रह्मानन्दरसों का तथा गुरुओं का वर्णन है।

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